रविवार, 29 जनवरी 2012

नरेन्द्र कुमार तोमर की कविताएँ

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1

पड़ चुके थे वोट

पड़ चुके थे वोट

हो चुके थे चुनाव

चल रही थी कांउटिग

आ रहे थे नतीजे-

सजे हुए एक आलीशान ड्राइगंरूम में

अंग्रेजी शराब के पेग चढ़ाते

बड़ी सी टीवी के सामने

बैठे सफेद पोष लोग

कोस रहे थे

प्रजातंत्र को/नेताओं को/जाहिल गंवारों को

किन लोगों को जिता दिया

किसे सौंप दिया राज

रसातल में जा रहा है मुल्‍क,

आंखों में लाल डोरे डाले

लड़खडा़ती जुबान से

कभी गुस्‍से ,तो कभी दुख के साथ

देश के लिए अपने लाल ,मोटे ,चिकने मुंह से

कोरस में निकाल रहे थे

उवाच/एक स्‍वर से /

सब थे एकमत-

कुछ नहीं हो सकता इस देश का-

सब के चिकने हाथ

एक से थे

किसी के बाएं हाथ की तर्जनी

के नाखून पर

काला निशान नहीं था ़

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2

अरसे से...

अरसे से इधर कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ

एक गेंद के पीछे भागते-दौड़ते

लड़ते-झगड़ते रहे बच्‍चे

काले बुरकों के पीछे से झांकती

आलू और प्‍याज पर चिकचिक करती रही औरतें

हाथ में मटमैला कलावा बांधे सब्‍जी वाली से

माथे तक सिर ढंके

अपनी किशोरी चुलबुली ननदों के साथ

नई-नवेली बहुएं

मनिहार से चूड़ियां चढ़वाती रहीं

अरसे से कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ

अलस्‍सुबह से मंदिर की घंटियों और

अजान की जुगलबंदी होती रही

शफीक मिस्‍त्री मंदिर का फर्श बनाता रहा,

रजिया और गुलाबो इर्ंटें ढोती रहीं

टूटी कमानी का पुराना चश्‍मा चढ़ाये

बूढ़े जुम्‍मन मियां

रामलीला के लिए धनुषबाण और गदा बनाते रहे

रामरथ सजाते रहे

मांग में सिंदूर भरे उदास औरतें

अपने बीमार बच्‍चे के लिए दरगाह से ताबीज लेती रहीं

कुछ लोग कसमसाते रहे, पर

अरसे से कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ।

रात को अपनी दुकानें बंद करके लड़के

गली के पीछे ठेले पर

तंदूरी चिकन और कबाब खाते रहे

घर में बाप बड़बड़ाते रहे

नहीं, कुछ नहीं हुआ

अरसे से इधर कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ।

ईदगाह से लगी जमीन को

पीरजादे ने चुपके से बेच दिया

वहां बसे कबाड़ी बेघर हो गये

कॉलोनाइजर ने हनुमान मंदिर खड़ा कर दिया

पुजारी ने

संतोषी माता के मंदिर की जमीन

खाड़ी से लौटे रफीक कुरैशी के नाम कर दी

चाय के भगोने में

लोग झाग बनकर उफने

और आग पर गिर कर ठंडे हो गये

कुछ नहीं हुआ, लोगों ने कहा

यही क्‍या कम हुआ।

मस्‍जिदें टूटती रहीं

मंदिर बिकते रहे

श्र्‌द्धा और आस्‍था माल में बदलती रहीं

लोग वैसे ही ढलते रहे

लड़ते-झगड़ते

लूटते-लुटते

एक होते, बिखरते रहे

तवे से कच्‍ची-पक्‍की रोटियां उतरती रहीं

चूल्‍हे पर ज्‍यादा पानी में थोड़ी दाल खनकती रही

खेतों-खलिहानों से बेदखल लोग

शहर में रिक्‍शे खींचते रहे

अपनी बूटी अम्‍मा, बीमार बाप को छोड़

सपना देखते दिल्‍ली जाते रहे

अरसे से कुछ नहीं हुआ

यही क्‍या कम हुआ।

-----------------------

3

निशान

काला निशान

बांए हाथ की

तर्जनी के नाखून पर लगा

काला यह निशान

जनतंत्र का,

मेरे अधिकार, तो कभी आक्रोश का

कभी बेबसी, तो कभी बलात का प्रतीक

यह चिह्न

सजीव और निर्जीव के मिलन स्‍थन पर

यह निशान

नाखून के बढ़ने के साथ

खिसकता जाता है

ऊपर उठता जाता है

कटने की ओर आगे बढ़ता जाता है -

जब यह नहीं रहेगा

मैं सोचता हूं

क्‍या मैं भूल जाऊंगा

यथार्थ की कठोर और निर्मम

धरती को

और मोरपंखी सपनों को

जिनके चलते मैंने पहली बार

दबाया था वो बटन -

क्‍या चिह्न

दिला पायेगा थोड़ा सा सुकून

दासता से कुछ राहत

परवशता से कुछ निजात

कौन जाने -

पर मैं यह जानता हूं

मेरे बाएं हाथ की उंगली पर लगे निशान

को पाने, हथियाने या लूटने के लिए

लोग बार-बार आयेंगे।

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जन्‍म उत्‍तर प्रदेश के एक कस्‍बे, मैनपुरी में लगभग 66 साल पहले। पढ़ाई के दौरान और उसके बाद अठारह उन्‍नीस साल तक छात्र,युवा एवं मजदूर आंदोलनों में होलटाइम कार्यकर्ता के तौर पर काम। पिछले लगभग 25 साल के दौरान 200 से अधिक डाक्‍यूमिेंटयों का निर्माण, निर्देषन एवं पटकथा लेखन,, तीसेक पुस्‍तकों तथा सैकड़ों लेखों-दस्‍तावेज़ों आदि का अनुवाद तथा लेख-कविताओं और यदाकदा लघुकथा एवं व्‍यंग्‍य लेखन। सामाजिक विसंगतियों, विरूपताओं कविता स्‍थाई निवास-2सी/25 आशीर्वाद, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद, 201010, फोन. 0120-4131283

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