सोमवार, 23 जनवरी 2012

कैस जौनपुरी की कविता - मैं रेल की पटरी हूँ...

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मैं रेल की पटरी हूँ...
मैं रेल की पटरी हूँ...
कुछ कहना चाहती हूँ...
मैं रेल की पटरी हूँ...
पड़ी रहती हूँ
अपनी जगह पर
लोग आते हैं
लोग जाते हैं
थूकते भी हैं
गन्दगी भी करते हैं
मगर मैं, रेल की पटरी हूँ...


चुपचाप सब सहती हूँ
कभी बुरा नहीं मानती
बस चुप ही रहती हूँ
क्योंकि मैं बुरा मानूंगी तो
लोग बुरा मानेंगे
लोग बुरा मानेंगे तो
लोग नहीं आएँगे
लोग नहीं आएँगे
तो मैं बुरा मानूंगी
इसलिए मैं कभी
बुरा नहीं मानती
क्योंकि मैं रेल की पटरी हूँ...


बुरा मानना मेरा काम नहीं
लोग कहते हैं
अगर बुरा ही मानना था
तो यहाँ बिछी क्यों हो...
उठो, खड़ी हो जाओ
अगर बिना बिछे
जिन्दा रहने की
हिम्मत रखती हो तो
मैंने तो नहीं कहा था
यूँ बिछी रहने को
यूँ पड़ी रहने को
अब बिछी हो
और पड़ी हो
तो नखरे न दिखाओ
यूँ ही बिछी रहो
यूँ ही पड़ी रहो
हमें आने दो
हमें जाने दो

मैं रेल की पटरी हूँ...
कभी-कभी सोचती हूँ
उठ जाऊं, खड़ी हो जाऊं
मगर फिर डरती हूँ
मैं तो एक रास्ता हूँ
अगर खड़ी हो गई तो
रास्ता न रहूँगी
और अगर रास्ता न रही तो
लोग नहीं आएँगे
फिर मैं खड़ी-खड़ी
सड़ने लगूंगी
जंग लग जाएगी मुझमें
फिर किसी कोने में
फेंक दी जाउंगी
क्यूंकि मैं हूँ ही क्या
एक रेल की पटरी ही तो हूँ
मैं उठ जाउंगी
तो दूसरी बिछ जाएगी
या बिछा दी जाएगी
आखिर रास्ता तो चाहिए ही
अगर रास्ता न होगा
तो लोग किधर जाएंगे
लोग भटकने लगेंगे
इधर-उधर
रास्ते की खोज में
कुछ गलत रास्ते पकड़ लेंगे
फिर मेरा क्या फायदा

मैं रेल की पटरी हूँ...
सोचती हूँ
क्यूँ मेरे नसीब में
सिर्फ बिछना ही लिखा है...
क्यूँ बोझ सहना ही लिखा है...
क्यूँ जब गलती से ही कोई फूल
मुझ पर आ गिरता है
तब आने-जाने वालों के कदम
कुचल देते हैं उस नाजुक फूल को
क्यों लोग कोई पत्ता भी
टिकने नहीं देते मुझपर
क्यूँ मैं मजबूर हूँ
धूप में जलने को
ठंड में ठिठुरने को
क्यूँ मैं हर मौसम में
मजबूर हूँ एक सी रहने को
क्यूँ नहीं मेरे भी
पंख निकल आते
मैं भी उड़ती
लोगों की तरह
लोगों के साथ
क्यूँ सब मुझे
इतना मजबूत समझते हैं...?
क्यूँ सब मुझे
गले नहीं लगाते...?
क्यूँ सब मुझे
पैरों तले ही रखते हैं...?
क्या इसलिए कि
मैं सिर्फ एक रास्ता हूँ...?
और रास्ता सिर्फ गुजरने
के लिए होता है...?
क्यूंकि रास्ता हमेशा
पैरों तले ही होता है...?

मैं रेल की पटरी
सोचती हूँ
क्यूँ न ऐसी दुनिया हो
जहाँ मैं भी सबको
गले लगा के चलूँ

मैं रेल की पटरी
थक चुकी हूँ
अब उठना चाहती हूँ
खड़ी होना चाहती हूँ
क्या कोई मुझे अपनी
बाहों का सहारा देगा...?


कैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com 

3 blogger-facebook:

  1. अच्छी सार्थक रचना..
    मगर पटरी का अस्तित्व ही बिछे रहने में है...दर्द सहने में है..
    उसका जीवन अंत ना हो जाएगा अगर वो उठ गयी???

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया विद्या जी,
      ये दर्द उस एक औरत का भी है जो कुछ पैसों के लिए बिछती है मगर कोई उसे अपनी बाहों का सहारा नहीं देता. लोग बस आते हैं और जाते हैं.

      हटाएं
  2. Rail ki patari ke saath-saath aur bhi kai logo ke dard bayan kardiye aapne...!

    उत्तर देंहटाएं

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