सोमवार, 2 जनवरी 2012

यशवन्त कोठारी का आलेख : रेगिस्तान का जहाज : ऊंट

ऊंट रेगिस्तान का जहाज है। यह एक विशालकाय और बहुत ही सहनशील पशु है जो कैमलायडी कुल का सदस्य है जो मेमेलिया वर्ग में आती है। ऊंट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बिना पानी पीये काफी दिनों तक न केवल जीवित रह सकता है बल्कि काफी श्रम भी कर सकता है। ऊंट दो प्रकार के होते हैं - अरब या एक कूबड़ वाला ऊंट जिसे कैमेलसड्रोमेडेरियस कहते हैं तथा 2 कूबड़ वाला ऊंट जिसे कै0 बैक्ट्रिएनस कहते हैं। यह पशु अब जंगलों में नहीं पाया जाता है। भारत में केवल एक कूबड़ वाला ऊंट ही पाया जाता है। राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब आदि प्रान्तों में ऊंटों की संख्या ज्यादा है। 1966 की गणना के अनुसार विश्व में लगभग 50 लाख ऊंट थे, जिसमें से भारत में 10 लाख हैं। भारत के कुल ऊंटों की आधी संख्या राजस्थान में है। ऊंट एक विशाल और मजबूत व ऊंचा पशु है जिसकी ऊंचाई 2 मीटर से 3 मीटर तक हो सकती है।

इसकी टांगे और गर्दन लम्बी तथा पीठ पर एक बडा सा कूबड़ होता है। इसके पैरों में गद्दियां होती है। नथुने पतले होते हैं जिस कारण से रेत नाक में नहीं जाती। इसके पहले और दूसरे अमाशयों की दीवारों में जल संचिकाएं होती है तथा कूबड़ में वसा भरी रहती है। यह पशु 25 लीटर तक जल का भण्डारण कर सकता है। इसके दांत नुकीले होते हैं तथा जुगाली के अलावा लड़ाई में भी दांतों का प्रयोग करता है। और एक ही स्थान पर खाने के बजाय चरना ज्यादा पसन्द करता है और मोटी-झोटी वनस्पति भी चाव से खाता है। भुसा, मौठ, मूंग, चना आदि का पूरक चारा भी दिया जाता है। ऊंट को ताजा फिटकरी भी पिलाई जाती है। यह पशु 5 वर्ष की उम्र में जवान हो जाता है और 40-50 वषरें तक जीता है। ऋतुकाल में नरपशु मदान्ध हो जाता है। शोर मचाता है, एक बार में एक मादा एक बच्चे को जन्म देती है तथा गर्भावधि 11-13 महीने की होती है। ऊंटनी अपने बच्चे को एक वर्ष तक दूध पिलाती है।

भारत में दो प्रकार के ऊंट पाये जाते हैं, (1) लद्दू ऊंट जो बोझ ढ़ोते हैं तथा (2) सवारी ऊंट - जो मुख्य रूप से सवारी के काम आते हैं। बोझा ढ़ोने वाले लद्दू ऊंट बड़े बलिष्ट होते हैं तथा मैदानी, रेगिस्तानी और पहाड़ी भागों में समान शक्ति के साथ काम करते हैं। ये ऊंट 400 किलो तक बोझा ढ़ो सकते हैं तथा 3 कि0 मी0 प्रति घंटे की गति से 30-40 कि0मी0 तक चल सकता हैं। सवारी के ऊंटों के पैर छोटे, छाती चौड़ी होती है। ये बिना रुके 100 कि0मी0 तक जा सकते हैं।

रेगिस्तानी ऊंट तीन प्रकार के होते हैं, बीकानेरी, जैसलमेरी और सिंधी ऊंट। जैसलमेरी ऊंट शक्ति, कार्यक्षमता में सबसे श्रेष्ठ होता है। ये ऊंट खेती तथा परिवहन दोनों के काम आते हैं। ऊंटों में प्रजनन हेतु राजस्थान राज्य अन्य राज्यों से काफी आगे हैं। ऊंटों में मदकाल दिसम्बर से मार्च तक रहता है। 6 वर्ष का ऊंट इस कार्य हेतु उपयुक्त है। एक ऊंट 30-50 ऊंटनियों से संगम कर सकता है। तथा 22 वर्ष की उम्र तक मद में आता है। ऊंटनी 4 वर्ष की उम्र से गर्भ धारण कर सकती है। ऊंटनियां 20 वर्ष की उम्र तक बच्चा दे सकती है। एक बार में एक बच्चा होता है तथा गर्भकाल 11-13 मास तक रहता है। गर्भपात एक सामान्य घटना है।

बीकानेर, गंगानगर आदि क्षेत्रों में ऊंटों का प्रजनन होता है। ऊंटों के प्रजनन में राजस्थान के बाद कच्छ (गुजरात) है। ऊंटों को सायबानो में रखा जाता है। सेना के ऊंटों को विशेष प्रबन्ध से रखा जाता है। नकेल से ऊंट को बांधा जाता है। ऊंट पर कसी जीन मजबूत होनी चाहिए तथा कूबड़ पर घाव न हो ऐसी व्यवस्था हो। ऊंटों की रोमावली बढ़ जाती है और इसे बसन्त ऋतु में काटकर कम्बल व अन्य गरम कपड़े बनाने के काम लिया जा सकता है। ठण्डे प्रदेशों में एक ऊंट से 5 किलो तक बाल प्राप्त किये जा सकते हैं। ऊंटों के प्रसिद्ध रोगों में गिल्टीरोग, निमोनिया, मोरा, अलर्क, सुर्रा तथा अन्य त्वचा रोग हैं।

ऊंट देश की अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका अदा करते हैं। खेत जोतने, बोझा ढ़ोने, परिवहन, पानी खींचने आदि में ये काम में आते हैं। राजस्थान में ऊंटों पर डाक सप्लाई की जाती है । पुस्तकालय चलाये जाते हैं तथा ऊंटों पर चल चिकित्सालय की व्यवस्था भी होती है। रेतीले क्षेत्रों में ऊंट ज्यादा लाभदायक पशु है। ऊंट गाड़ी पर 500 किलो तथा पीठ पर 300 किलो बोझा ढ़ो सकता है।

देश की सेनाओं, सीमा सुरक्षा बलों, स्काउट, पुलिस आदि में भी ऊंटों का योगदान प्रमुख हैं। राजस्थानी सीमाओं पर तस्करी रोकने, गश्त लगाने तथा सेनाओं की मदद भी ऊंट करते हैं। युद्ध में प्राचीन काल में ऊंटों का उपयोग हाथी तथा घोड़ों के साथ-साथ होता था। कई प्रेम कहानियों में ऊंट ने अपनी भूमिका अदा की है। रेगिस्तानी क्षेत्रों की संस्कृति, परम्परा, व्यापार, उद्योग, सुरक्षा सभी में ऊंट एक महत्वपूर्ण पशु है। आज भी हजारों परिवार ऊंटों की आमदनी से अपना खर्चा चलाते हैं। ऊंट उनकी रोजी-रोटी का महत्वपूर्ण साधन है। साहित्य, संस्कृति, कला, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य, भित्ति चित्रों सभी में ऊंटों को प्राथमिकता से उकेरा जाता है। ढोलामारु की अमर प्रेम कहानी हो या लैला मजनूं की दास्तान बिना ऊंट के अधूरी है।

ऊंटों का उपयोग परिवहन, खेती, व्यापार के अलावा भी किया जा सकता है। ऊंट के कई उत्पाद है जो काम में आते हैं। ऊंटों से बाल चमड़ा, मांस, कच्ची अस्थियां, दूध तथा खाद प्राप्त किये जाते हैं।

ऊंट के बाल बसन्त में उतार कर ऊन बनायी जाती है। एक बार में 4-5 किलो बाल प्राप्त किये जा सकते हैं। ऊंट के बाल मुलायम, मजबूत तथा बारीक होते हैं। इनसे कम्बल, रग और ओवरकोट बनाये जाते हैं। ऊंट के बालों को निर्यात भी किया जाता है।

ऊंटनी का दूध ऊंट पालकों के लिए एक खाद्य पदार्थ है। ऊंटनी का दूध हड्डी टूट जाने पर मालिश के काम आता है। औसतन एक ऊंटनी प्रतिदिन 10 किलो तक दूध देती है। यह दूध मृदु विरेचक होता है तथा तिल्ली के रोगों में लाभकारी है। यह दूध जलशोथ, पीलिया, आदि में भी लाभ देता है।

ऊंट की खाल का चमड़ा भी बक्सों, सूटकेसों, कुप्पे आदि बनाने के काम आता है। दस्तकारी तथा हस्तशिल्प के कुछ अच्छे नमूने बीकानेर में ऊंट की खाल पर बनाये गये हैं। जो दर्शनीय हैं। ऊंट का मांस कठोर तथा मीठा होता है। ऊंट की आंतों से सुन्दर कुप्पियां बनायी जाती है।

ऊंट का गोबर (मैंगनी) जलाने के काम आती है। इसमें नौसादर की मात्रा ज्यादा होती है। ऊंट का गोबर खाद के रूप में भी खेतों में डाला जाता है। नौसादर होने के कारण खेतों से अच्छी उपज मिलती है।

ऊंटों पर शोधकार्य हेतु एक राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान शाला की स्थापना बीकानेर में की गयी है।

ऊंट हम सभी के लिए बहुत उपयोगी जानवर है और इसके प्रजनन तथा नस्ल सुधार की ओर संख्याओें को विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि ऊर्जा के संकटकाल में वैकल्पिक कार्य ऊंट व अन्य पशुओं से कराये जा सकें।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर302002 फोन 2670596

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  1. ऊँटों पे बहुत सवारी की है , आज उनके बारे में विस्तृत जानकारों मिली ,
    उटनी के बच्चे का लालन पालन बहुत मेहनत का काम है

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऊँट पर इतनी सारी जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

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