गुरुवार, 5 जनवरी 2012

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविताएँ

किसने कहा था आपसे नाखून चबा लो।


मेरा भविष्य भूत ,अब इतना न खंगालो
गिरता हुआ मैं पेड़ हूं कैसे भी संभालो।

बेटे की तरह हूं तेरा ,तू मां की तरह है
परदा न करो मुझसे, घूंघट न निकालो।

टूटे हुये तारों की तरह गिर रहा है ये
हाथ बढ़ाकर मेरा ये देश बचालो।


यह ठीक है कि शर्म से गर्दन झुकाई है
किसने कहा था आपसे नाखून चबा लो।


मन उदास हो कहीं या सिर में दर्द हो
जाकर किसी पड़ोस के बच्चे को खिला लो।

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बिना इजाजत मां के कोई काम नहीं अब‌ तक करता।

एक तरफ सब धन दौलत रख एक तरफ मां की ममता
देख ठीक से पलड़ा हर दम मां की तरफ झुका मिलता।

आँख बंद करले धीरे से और हाथ छाती पर रख
देख सामने ध्यान लगाकर बस मां का चेहरा दिखता।

किसी और की माताजी को जब जब भी मैंने देखा
हर माता का चेहरा मुझको अपनी मां जैसा दिखता।

सपने में भी बार बार जब मैं मां का चेहरा देखूं
देख देख उस चेहरे को मन मेरा कभी नहीं भरता।

नहीं सामने मां है लेकिन याद अभी तक बाकी है
बिना इजाजत मां के कोई काम नहीं अब‌ तक करता।

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