रविवार, 8 जनवरी 2012

क्या आप भी अपनी रचना को ब्लाग/ईपत्रिकाओं पर खपने या उसे छपवाने की शीघ्रता और उत्सुकता में उसका नख- शिख नहीं संवारते?

image

वर्षों से मैं अंतर्जाल से जुड़ी हूँ और विश्व के कोने-कोने में मेरे साहित्यिक मित्र अंतर्जाल की देन हैं। कई से मैं मिली नहीं पर वे अपने से लगते हैं। उनके दु:ख-सुख मेरे हैं। तकनीकी प्रगति के इस युग में अंतर्जाल मानव को बहुत करीब ले आया है। यही निकटता भाषाओं में भी है। भाषाओं की प्रगति और प्रसार में अंतर्जाल का योगदान सराहनीय है। हिन्दी साहित्य को इसने बहुत से नए रचनाकार दे कर समृद्ध किया है।

' हिन्दी चेतना ' की अंतर्जाल पर सार्वजनिक घोषणा के साथ ही रचनाओं की भरमार लग जाती है। बहुत अच्छा लगता है, नए -नए रचनाकारों के बारे में जान कर।

एक बात को नजर-अन्दाज नहीं किया जा सकता कि कई रचनाकार अपनी रचना को ब्लाग पर खपने या उसे छपवाने की शीघ्रता और उत्सुकता में उसका नख- शिख नहीं सँवारते। इस के लिए समय और धैर्य की आवश्यकता होती है। जिसकी कमी रचना को कमजोर बना देती है। कच्ची रचना ब्लाग या वेब पर डाली जाती है। और उन पर टिप्पणियाँ देने वालों की भरमार लग जाती है। रचनाकार सोचने लगता है कि वह बहुत अच्छ लिखता है और उसकी रचना उत्तम है। यहीं से आगे बढ़ने की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।

कुछेक नवोदित रचनाकारों को मैंने इसी गलतफहमी का शिकार देखा है, हालांकि उनमें श्रेष्ठ सृजन की बहुत संभावनाएँ हैं। यह सब आप मैं इसलिए साझा कर रही हूं कि टिप्पणियाँ उत्साहित जरूर करती हैं और रचने की प्रेरणा भी देती हैं पर वे रचनाकार पर हावी नहीं होनी चाहिए। लेखन के लिए अनुशासन, धैर्य, निष्ठा, समर्पण और समय की आवश्यकता है। लेखन तपस्या है, साधना है। साहित्यिक पृष्ठभूमि वाले मेरे परिवार में ये मूल बातें मन्त्रों के उच्चारण सी दोहराई जाती थीं और ये मेरे मन-मस्तिष्क पर छाई हुई हैं। आज भी मेरी कोई रचना छपती है तो एक वरिष्ठ कथाकार जो मेरे गुरु समान हैं, मेरी रचना पर कभी आलोचनात्मक और कभी समीक्षात्मक टिप्पणी ईमेल से भेज कर आगाह करते हैं कि प्रशंसा से प्रभावित नहीं होना और लेखन में एकाग्रचित्त रहना है।

मित्रों! सही कहते हैं गुरु समान वरिष्ठ कथाकार। इससे पहले कि प्रशंसा अहम् को बढ़ा कर एक जाल बुन दे और वह जाल अहम् से ही कसता चला जाए, इतना कस जाए कि उससे निकलना कठिन हो जाए, सतर्क हो जाना चाहिए।

नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ. ..

आप की मित्र,

सुधा ओम ढींगरा

--

(साभार - हिन्दी चेतना जनवरी-मार्च 2012)

6 blogger-facebook:

  1. RACHANAKAR WEBSITE MUJHE BAHUT ACHACHHA LAGA. MAI BHI CHAHTA HU KI RACHAKAR PAR MAI LAGATAR JAU. MERA EMAIL rambalaksahara@gmail.com
    blog biharblogerassociation.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. sudha ji aapki baat ek dam sahi hai .aapne bahut hi sahi baat sunder tarike se kahi hai
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. SUDHA OM DHEENGRA KE BEBAAQ LEKHAN KEE MAIN
    TAAREEF KARTAA HUN . UNKEE LAGAN ,IMAANDAAREE
    AUR UNKE PARISHRAM SE HINDI CHETNA KAA RANG -
    ROOP KHOOB NIKHRA HAI AUR AAJ USKEE LOKPRIYTA
    SARV VIDIT HAI .

    उत्तर देंहटाएं
  4. बिलकुल सही कहा है आपने सुधा जी...आपकी राय हमेशा ही हमारे लिए कीमती है....सादर

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुधा ओम ढींगरा जी,
    उम्मीद करता हूँ कि आपके इस लेखकोपयोगी लघु लेख से लेखकगण कुछ सीख अवश्य लेंगे... आपको साधुवाद कि आपने साहसपूर्वक लिखा।

    संभवतः आप सहमत होंगी कि हिन्दी में बहुत से ऐसे भी लेखक सक्रिय हैं, जो उच्च सरकारी पद का अनुचित लाभ उठाकर साहित्य में मन बहलाने में सफल हो रहे हैं। उनमें साहित्य-सृजन की कोई प्रतिभा नहीं होती है...मात्र बुद्धि-विलास। हाँ, यदि वे समर्पित होकर कुछ सीखना चाहें, तो उनका लेखन कमोवेश निखर भी सकता है। ऐसे लेखकों के लेखन (वस्तुतः बौद्धिक व्यायामयुक्त शब्द-संयोजन) का साहित्यिक क़द उनके रिटायरमेण्ट (पद-मुक्ति) के बाद ‘शून्य’ पर आकर ठहर जाता है...फिर भले ही उन्होंने अपने लड़खड़ाहट-भरे लेखन पर चाहे जितने भी शोध या आलेख अथवा ग्रंथ छपवा लिए हों...‘स्व’ पर केन्द्रित चाहे जितने भी विशेषांक पैसे देकर अथवा किसी पत्रिका को कोई अन्य लाभ दिलवाकर छपवा लिए हों। वे पदासीनता के समूचे कालखण्ड में पूर्णतः मुग़ालते में रहते हैं। यह मुग़ालता उन्हें इस सत्य का भी एहसास नहीं होने देता कि देश के अधिंकांश लेखक एवं सही साहित्यिक समझ रखने वाले पाठकगण उनके नाम की हँसी उड़ाते हैं...। ये लोग किसी अन्य लेखक/साहित्यकार से अपने लिखे पर आलेख लिखवाने के लिए फोन आदि पर सुबह-दोपहर-शाम नाक में दम कर देते हैं। पिण्ड छुड़ाने के लिए उन बेचारों को थोड़ी-बहुत शब्दारती उतार देनी पड़ती है। यह शब्दारती उन छद्‌म लेखकों को मुग़ालते में डाले रहती है।

    इन्हीं उच्च आधिकारियों के बीच कुछेक गिने-चुने जेनुइन लेखक भी हैं। अधिकारी-वर्ग से आने वाला यह अत्यल्पसंख्यक ‘जेनुइन’ लेखक-वर्ग पहले साहित्यकार होता है, बाद में अधिकारी। ऊपर मैंने जिस अधिकारी-वर्ग की ओर संकेत किया है, वह साहित्यकार बाद में है, अधिकारी पहले। यदि उनके नाम के साथ ‘अधिकारी’ पद न जुड़ा हो, तो शायद ही कोई संपादक/प्रकाशक उनकी रचना प्रकाशित करे। पैसे देकर छप जाये, तो वह अलग बात है। इस बिन्दु पर कई पत्रिकाओं की साहित्य-निष्‍ठा पर भी प्रश्‍न-चिह्न आकर चिपक जाता है।

    ख़ैर...हे मुग़ालता, तुझे सलाम!

    उत्तर देंहटाएं
  6. आदरणीया सुधाजी,
    आपका यह आलेख मेरे बहुत काम आयेगा ऐसा मेरा विश्वास है ,
    और इसके लिए आप को शतस: धन्यवाद ।
    मेरी ये पुरानी आदत है कि मैं लिख तो जाता हूँ पर अपने लिखे को दुहरा
    नहीं पाता और ढेरों अशुद्धियाँ रह जाती हैं । ये लिंग , ह्रस्व दीर्घ या फ़िर
    समय पर शुद्ध भाषा नहीं सूझने से अक्सर हो जाता है , और मैं साहस
    नहीं जुटा पाताकि उन्हें कहीं प्रकाशनार्थ भेज सकूँ ।
    तब गोस्वामी तुलसीदास को याद कर के रह जाता हूँ " स्वान्त: सुखाय "
    लिखने का ॥......अचल.......

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------