बुधवार, 18 जनवरी 2012

विष्णु नागर का व्यंग्य : ईश्वर में विश्वास

किसी ने मुझसे पूछ लिया कि भाईसाहब आप ईश्वर में विश्वास क्यों करते हो? मेरा मूड उस समय कुछ खराब था. मैंने कह दिया कि छोटे भाई, मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं या आदमी में या चूहे में या उच्च में, यह पूछनेवाले तुम कौन? तुम क्या लाटसाहब हो? यह मेरा अत्यंत व्यक्तिगत मामला है. तुम्हें मुझसे ऐसा सवाल पूछने का कोई हक नहीं है. फिर भी जैसा कि आप जानते हो, मैं बदतमीज भले ही हूं मगर अंतत: हूं तो एक भला आदमी ही. मैंने पहले तो उससे अपने इस व्यवहार की माफी मांगी और फिर उसे बता दिया कि मैं आखिर ईश्वर में विश्वास क्यों करता हूं और जब उसे ही बता दिया तो फिर आपको बताने में क्या दिक्कत है, सो बता देता हूं पेश है आपकी खिदमत में ईश्वर में विश्वास करने के मेरे अपने कारण-

१. आजकल हजार में चार लोग भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते. यहां तक कि आजकल की युवा पीढ़ी के लोग भी बहुतायत में मंदिर-मस्जिद में दीखते हैं. इसलिए मैं भी इस हालत को देखकर सबकी तरह ईश्वर पर विश्वास कर लेता हूं इस तरह बहुमत के साथ होकर लोकतंत्र में अपने विश्वास को पुष्ट भी कर देता हूं

२. ईश्वर में विश्वास करने का एक कारण यह है कि अगर मैं उस पर विश्वास न करुं ' तो फिर किस पर करूं? सरकार पर, मंत्री. पर, एमएलए पर, अफसर पर, दलाल पर, : घोटालेबाज पर, चोर पर, पुलिस पर या - अपनी किस्मत पर? ये सबके सब धोखेबाज हैं. तो इसलिए ईश्वर पर ही विश्वास कर लेता हूं वरना लोग कहें कि इसे देखो, ये बुड्ढा हो रहा है मगर इसे किसी पर विश्वास नहीं, अजीब अहमक इनसान है. अब तक भी इसे अकल नहीं आयी तो कब आयेंगी? तो यह बताने के लिए कि नहीं जनाब, मुझे अकल आ चुकी है, मैं ईश्वर पर विश्वास कर लेता हूं

३. मैं ईश्वर पर इसलिए भी विश्वास कर लेता हूं क्योंकि हमारे देश में किसी को भी जो कुछ मिलता है या नहीं मिलता है, वह अकसर इस कारण मिलता या नहीं मिलता है कि वह बड़ा योग्य है या बहुत अयोग्य है. यहां म भी इसलिए मिलता है या नहीं मिलता है कि वह फलां जाति का है या नहीं है, वह फलां धर्म या फलां क्षेत्र या फलां पार्टी का है या नहीं है, वह फलां या फलां का आदमी है या नहीं है वह फलां या फलां का रिश्तेदार है या नहीं है या उसने फलां को इतने रुपये चटाये हैं या नहीं चटाये हैं. इसलिए इस हालत में बेहतर यही है कि आपके पास कोई और उपाय न हो तो सब कुछ ईश्वर की मर्जी पर छोड़ दो, भले ही उस बेचारे का कहीं कोई अस्तित्व हो या न हो. अच्छा हो जाए, तो आप आसानी से इसे उसकी कृपा मानकर खुद के विनम्र होने का भ्रम पाल सकते हैं और अच्छा नहीं हो, बुरा हो जाए तो कह सकते हैं कि हमने तो सबकुछ उस पर छोड़ रखा है. ईश्वर ने हमारा भला सोचकर ही फिलहाल हमारा काम अभी नहीं होने दिया होगा क्योंकि ईश्वर तो सर्वव्यापी है, वह सबकुछ देखता और जानता है. उससे कुछ भी छिपा नहीं है. और जब ईश्वर किसी का बुरा सोचता नहीं है तो अपना क्यों सोचेगा? अपना उससे तो अब कोई झगड़ा भी नहीं है. जब था तब था. और झगड़ा हो तो भी ईश्वर इतना ओछा नहीं है कि इतनी छोटी- सी बात पर ध्यान दे और हमसे बदला ले.

४. ईश्वर में इसलिए भी विश्वास करता हूं कि सिर्फ एक वही है, जो खुद किसी से आकर नहीं कहता कि तुम मुझ पर विश्वास करो और अगर नहीं करो तो मैं तुम्हें बर्बाद कर दूंगा जबकि बाकी सब कहते हैं कि मुझ पर विश्वास करो तो सब ठीक रहेगा वरना तुम तुम्हारी जानो. फिर बाद में हमसे मत कहना कि ऐसा हो गया और वैसा हो गया. फिर उम्मीद मत रखना कि हम सबकुछ ठीक कर देंगे.

5. आजकल अस्पताल में इलाज कराना मुश्किल, जल में बच्चे का दाखिला कराना मुश्किल, नौकरी कहीं पाना मुश्किल, सड़क पर सुरक्षित चलना मुश्किल... ऐसे में ईश्वर पर विश्वास करने के अलावा और चारा भी क्या है? क्या पता ऐसा करने के बाद किसी पुरानी बीमारी में आराम मिल जाए, किसी अच्छे जल में बच्चे को दाखिला मिल जाए, औलाद को धक्के खाते - खाते कहीं नौकरी मिल जाए, दुर्घटना होते-होते बच जाए या दुर्घटना तो हो जाए मगर हम बाल-बाल बच जाएं. क्या पता किसी बाबा के दिये गडे- ताबीज के बाद किसी संयोग से बिगड़ा काम कभी बन ही जाए, हौम्योपैथी की मीठी गोलियां भी असर कर जाएं, किसी को अपनी हालत पर बेवजह तरस आ जाए, कौन बनेगा करोड़पति शो का बुलावा आ जाए और वहां अपनी किस्मत खुल जाए. लड़की की शादी बिना दहेज हो जाए, मुकदमे में अपने पक्ष में फैसला हो जाए... वैसे भगवान को खुश करने के लिए ज्यादा चाहिए भी क्या? गुड़- चने का प्रसाद उसके लिए काफी है, लेकिन बाकी का काम इतने से बिलकुल नहीं चलता. वह इतना देखकर उसे हिकारत से जमीन पर फेंक देगा. इसलिए भी मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूं मतलब ये है कि किसी न किसी उद्देश्य से ही मैं उस पर विश्वास करता हूं ये दुनिया है ही मतलब की और हम इस दुनिया से अलग थोड़े हैं..

६. और भई इसलिए भी विश्वास करता हूं कि यह ईश्वर आखिर है तो हमारी रचना ही. जानवर या पक्षी तो उस पर विश्वास नहीं करते, वे किसी मंदिर- मस्जिद-गुरुद्वारे में जाकर मत्था नहीं टेकते, किसी पंथ- धर्म को नहीं मानते, स्वर्ग-नरक से नहीं डरते. तो जिस ईश्वर को हम मनुष्यों ने बनाया, जो हमारी रचना है, उस पर विश्वास कर लेने में बुराई भी क्या है, क्योंकि उसकी असलियत भी तो सिर्फ हमीं जानते हैं..

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(नवनीत हिंदी डाइजेस्ट अप्रैल 2011 से साभार)

4 blogger-facebook:

  1. विष्‍णु जी का जवाब नहीं। उनकी व्‍यंग्‍य करने की शैली अदभुत है।

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  2. वाकई ... ईश्वर अपनी ही रचना है

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  3. वाकई ... सच कहा आपने जब ईश्वर हमारी ही रचना है तो हमे उस पर विश्वास करने मे क्या जाता है। बहुत ही बढ़िया व्यङ्गात्म्क प्रस्तुति...

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