मंगलवार, 17 जनवरी 2012

एस. के. पाण्डेय के दोहे

।। दोहे-(३) ।।

हाथ लगाते हम नहीं रुपया पैसा माल ।
यसकेपी देना चहो दीजे झोली डाल ।।

माया कहि माया फँसे यह माया को जाल ।
यसकेपी छूटे नहीं माया बड़ी कराल ।।

जग जीवन सपना सही माया है बिकराल ।
यसकेपी जागे नहीं जागे आया काल ।।

माया से बचते वही जिन्हें बचाते राम ।
यसकेपी बिन राम के कहीं नहीं आराम ।।

राम बहाने ढूढ़ते यसकेपी जो दाम ।
उनकी करनी को कहे हो जाते बेकाम ।।

यसकेपी कहते सही मानव माने होय ।
बिन मानें मानव नहीं मानवता कह रोय ।।


मानव अब नहि मानते गो आदिक भगवान ।
यसकेपी बस हो गए मान और अभिमान ।।

मातु पिता की पूछते यसकेपी नहि बात ।
करतब अब ऐसे करें पशुता भी शरमात ।।

पशु को था नहि मानना नियम और नहि नीति ।
यसकेपी पशु, पशु अभी करते नहीं अनीति ।।

मानव को था मानना नियम और बहु नीति ।
यसकेपी नहि मानते करने लगे अनीति ।।

यसकेपी नहि होत हैं पशु को नमक हराम ।
मानव सच में जानते केवल अपना काम ।।

यसकेपी बढ़ने लगे जग खल दल बहु चोर ।
चला सही संसार अब बढ़ पशुता की ओर ।।

जन्मै अगर कपूत सो ते नहि कवनव काम ।
यसकेपी सपूत एक बहुत बढ़ावे नाम ।।

गदही जाए बीस सुत मर-मर करती काज ।
यसकेपी यक सुत भये करै शेरनी राज ।।

यसकेपी संसार में भाँति-भाँति के लोग ।
कुछ तो लहैं बियोग सुख कुछ पावैं संयोग ।।

खाते-खाते कुछ मरैं कुछ भूंखे मर जाँय ।
खाने वाले कह चले भूंखे नहीं दिखाँय ।।

कुछ लेकर दै देत हैं कुछ लेकर नहि देंय ।
कुछ देकर लै लेत हैं कुछ देकर नहि लेंय ।।

जो आता संसार में सो देता है रोय ।
यसकेपी नहि को मिला जो रोया नहि होय ।।

यसकेपी सच ही कहा जग है दुख का मूल ।
माया ऐसी ठगिनि है जाय कौन नहि भूल ।।

यसकेपी संसार अस आते देत रुलाय ।
जो कोई जाना चहै उसको लेत बुलाय ।।

यसकेपी इस राज का को नहि जानै राज ।
जगने आये सो रहे उड़ा लै गयो बाज ।।

यसकेपी साधू कहैं बोलो मधुरी बात ।
ऐसी बोली बोलते उर लागत आघात ।।

चाय जलाती जीभ को गुनि देखो मन माहि ।
जली जीभ से माधुरी बोली निकसत नाहि ।।

बहुत बधाई आपको बने कहैं कछु काम ।
यसकेपी मन खीझते देखे लोग तमाम ।।

जनमदिवस आये बहुत खुशियाँ हों भरपूर ।
यसकेपी मन में कहैं अंत लगत है दूर ।।

यसकेपी कहते कई दुल्हन बड़ी दहेज ।
लेना-देना खुब चले नहि कोई परहेज ।।

दो मूठा चावल मिले नहीं चाहते और ।
यसकेपी धन के बिना दुल्हन को नहि ठौर ।।

यसकेपी संसार की कही न जाए बात ।
दंभ कपट छल धूरता दिन-दिन जग अधिकात ।।
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                                                      डॉ. एस. के. पाण्डेय,
                         समशापुर (उ. प्र.) ।
      URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/
           ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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