गुरुवार, 5 जनवरी 2012

जयप्रकाश मिश्र की कविता

रात उनके साथ सोने के लिए राज़ी न थी ,

कागजों और पन्नियों की आग भी काफी न थी .

 

बस वही फुटपाथ जीने और मरने के लिए ,

एक अंगुल भर ज़मीं अब शहर में खाली न थी .

 

सोचता हूँ ,मर गए जो सर्दियों की रात में ,

मौत उनकी ज़िन्दगी के बोझ से भारी न थी .

 

मयकशी थी , शोरगुल  था और थी हिंसा वहां ,

पर किसी के भी ज़ेहन में गांधीवादी न थी .

 

तब कहाँ थे ,जब लुटा था मुंबई का ताज वो ,

आपके अंदाज़ में तब तो ये जांबाजी न थी .

 

बेच दी हैं मालियों ने खुशबुएँ बाज़ार में ,

बाग़ में कोई कली खिलाती हुई ताज़ी न थी .

 

जयप्रकाश मिश्र

ईमेल - mishrajayprakash262@gmail.com

फेसबुक पर - jayprakashmish

ट्विटर पर - jayprakashmish1

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