रविवार, 29 जनवरी 2012

धर्मेन्द्र कुमार सिंह की कविता - पैसे का प्रवाह

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गर्मी

ठंढक की तरफ बहती है

विद्युत धारा

कम विभव की ओर बहती है

पानी

नीचे की तरफ बहता है

ऊर्जा का हर स्वरूप

हमेशा बहता है

ज्यादा से कम की तरफ

ये प्रकृति का नियम है

मगर पैसा

उसी ओर बह रहा है जहाँ ज्यादा पैसा है

 

ये तभी संभव है

जब पैसे का नीचे की ओर बहाव

रोक दिया गया हो

आसमान तक ऊँचे एक बाँध से

और इस बाँध की दीवारों से टकराकर

मजबूरन पैसा बह रहा हो प्रकृति के खिलाफ़

बाँध के नीचे की तरफ बसने वाले

खुश हैं

कभी कभी छोड़े गए कुछ लीटर पैसों से

और माँगते हैं ईश्वर से

कि बना रहे बाँध

ताकि बनी रहें हमारी झोपड़ियाँ

कयामत तक चलता रहेगा ये क्रम

 

अगर छोड़ा न गया झोपड़ियों का मोह

और खत्म न हुआ बाँध टूटने का डर

बाँध टूटेगा

तो लेगा ही

कई झोपड़ियों और लोगों की बलि

पर जो कुछ बचा रहेगा

वह देखेगा

एक बार फिर

पैसे को बहते हुए

प्रकृति के नियमानुसार


--


धर्मेन्द्र कुमार सिंह
वरिष्ठ अभियन्ता (जनपद निर्माण विभाग - मुख्य बाँध)
बरमाना, बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश
भारत

1 blogger-facebook:

  1. वरिष्ठ अभियन्ता के (कवि ह्रदय) मन से निकले उद्गार पढ़कर मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ हो चला है कि कवि कर्म सभी को करना चाहिए ताकि हर क्षेत्र के अनुभवों से साहित्य समृद्ध हो सके।
    ..बधाई इस कविता के लिए।

    उत्तर देंहटाएं

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