रामदीन की कविता - नया साल मुबारक

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

‘‘अर्थ सत्‍य''

नया साल मुबारक

नया साल अस होय मुबारक, रहे न भूखा नत्‍था।

ऐसी की तैसी हो जाये, ठग, बेइमानी सत्‍ता।

 

पेट को रोटी, खेत को पानी, रहें मस्‍त सब नत्‍था।

तभी मुबारक असली होगा, तनहा हो या जत्‍था।

 

झक-झक कुरता वाले करते, अनशन जाने कैसा ?

भरे पेट में करेगा नत्‍था, अनशन उनसे अच्‍छा।

 

नये में खुशियां आयें, सरबतिया के द्वारे पर ।

दो बैलों की जोड़ी आये, रमदसुआ के द्वारे पर ।

 

नया साल अस होय मुबारक, रहे न भूखा नत्‍था।

ऐसी की तैसी हो जाये, ठग बेइमानी सत्‍ता।

 

परबतिया भी हिम्‍मत करके भेजे मुन्‍ना पढ़ने को।

उसको भी ताकत दे दाता खुला हिमालय चढ़ने को ।

 

बड़े भंवर में फंसा है नत्‍था कैसे हो बेड़ा पार ?

झूठें वादों, अरमानों में फँसता बारम्‍बार।

 

भरे पेट वाले ना खायें, अनशन उसको कहते हो।

ज्ञानी, खबरनवीस, सन्‍तरी, चिन्‍ता उनकी करते हो।

 

नत्‍था भी अनशन कर सकता लेकिन उसका पेट भरा दो।

उसकी भी सन्‍तानों को कुछ कान्‍वेंट दाखिला करा दो।

 

सबसे अच्‍छा करेगा अनशन, दुनिया होगी दंग।

एक बार भरपेट मिले जो, फिर देखो अनशन के रंग।

 

नया साल अस होय मुबारक, रहे न भूखा नत्‍था ।

ऐसी की तैसी हो जाये, ठग, बेइमानी सत्‍ता।

--

रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी,

कृष्णानगर, लखनऊ-23

मो0ः 9412530473

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "रामदीन की कविता - नया साल मुबारक"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.