रविवार, 29 जनवरी 2012

गोवर्धन यादव की लघुकथा - भूख

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भूख .

"क्यों भाई...अच्छे खासे हट्टे- कट्टे नौजवान हो, कोई काम- धंधा क्यों नही करते.,भीख माँगते हुये तुम्हें शर्म आनी चाहिये"

"शर्म तो बहुत आती है साहब ,मगर कोई काम देता ही नहीं. चलिये आप ही मुझे कोई छोटा- मोटा काम दिला दीजिये. मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे पूरी इमानदारी असुर पूरी निष्ठा के साथ पूरा करुँगा."

:" अच्छा ये तो बतलाओ कि घर और कौन कौन हैं ?"

"एक बूढी अपाहिज मां है,जो काफ़ी लंबे समय से बीमार पडी है. अभी वह तवे सी तप रही है,"

"तो उसका इलाज क्यों नहीं कराते. उसे अस्पताल- वस्पताल ले जाओ ,मुफ़्त में इलाज हो जायेगा. और उसे दवा भी मिल जायेगी."

" साहबजी, ठीक कहा आपने कि उसे अस्पताल ले जाऊँ तो वह ठीक हो जायेगी, लेकिन उसका इलाज कराने से भी कोई फ़ायदा नहीं है. अगर वह ठीक हो भी गई तो भूख में नाहक ही तडपेगी . जब मैं स्वयं का पेट नहीं भर पाता तो उसे क्या खिलाउंगा. उसका मर जाना ती ठीक रहेगा."

बडी ही बेबाकी एवं निष्ठुरता के साथ उसने अपने मन की बात कह दी थी, ऐसा कहते हुये न तो उसे कोई ग्लानि हो रही थी और न ही कोई शिकन उसके चेहरे पर दिख रही थी.

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गोवर्धन यादव 103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

07162-246651

4 blogger-facebook:

  1. बेनामी6:32 pm

    Acchi laghu katha sahi chitran aaja ke samaya ka
    prabhudayal

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद. आपको रचना पसंद आयी.

      हटाएं
  2. सत्य बहुत कडुवा होता है. और यह वही है.

    उत्तर देंहटाएं

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