अनुराग तिवारी की कविता - जाड़े के छंद

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जाड़े के छंद

कई दिनों के बाद आज फिर धूप खिली है।

कुहरे की चादर से जग को मुक्‍ति मिली है।

 

बैठे आँगन में सब खायें छान पकौड़ी।

बीच बीच लें चाय की चुस्‍की थोड़ी थोड़ी।

 

बर्फीली पछुआ है सबके हाड़ कँपाती।

दीन, हीन, बूढ़े, बच्‍चों को खूब सताती।

 

कभी कभी सारा दिन बीते, कुहरा छाया रहता है।

सूरज जैसे ओढ़ रजाई, अलसाया सा रहता है।

 

गली, मुहल्‍ले, चौराहों पर जले अलाव हैं।

घेरे बैठे ताप रहे सब हाथ पाँव हैं।

 

नये नये फल औ' सब्‍जी से मंडी पटी हुई है।

क्रिसमस और नये साल की मस्‍ती चढ़ी हुई है।

 

आओ कुछ उनकी भी सुधि लें, जो गरीब, बेघर हैं।

धरती है जिनकी शैया और छत अम्‍बर है।

 

कुछ गर्म वस्‍त्र उनको भी दें, जितनी हो शक्‍ति हमारी।

शीत ऋतु होती है, सब ऋतुओं पर भारी।

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-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

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संक्षिप्‍त परिचय

नाम ः अनुराग तिवारी

पिता का नाम ः स्‍व. राम प्‍यारे तिवारी

माता का नाम ः स्‍व. सुशीला देवी

जन्‍म तिथि ः 09.05.1970

जन्‍म स्‍थान ः हमीरपुर, उ.प्र.

शिक्षा ः शिक्षा वाराणसी में हुई। काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय से बी. काम. उत्‍तीर्ण

करने के बाद चार्टर्ड एकाउन्‍टेन्‍सी की परीक्षा उत्‍तीर्ण की और तब से

बतौर सी. ए. प्रैक्‍टिस कर रहा हूँ।

लेखन ः साहित्‍य के प्रति मेरी रुचि बचपन से ही रही है और तभी से कविताएँ

लिखता आ रहा हूँ। मेरी कविताएँ कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो

चुकी हैं।

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3 टिप्पणियाँ "अनुराग तिवारी की कविता - जाड़े के छंद"

  1. बहुत बढ़िया...
    शुभकामनाएँ...

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  2. बेनामी1:08 pm

    aapney to sardiyoo ka varnan badi sunderta key saath kiya hey....best wishes.....kalpana.varanasi

    उत्तर देंहटाएं

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