शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

अनीता कपूर का आलेख - “विश्व हिन्दी ज्योति” : प्रवासी हिन्दी संस्था

 

ज अमरीका में हिन्दी भाषा कितनी आगे बढ़ चुकी है उसका एक साक्षी , रास्ते में बे-ट्रांसिट की बस पर मेक्डोनाल्ड का विज्ञापन को हिंदी में लिखा हुआ पाया , पहले तो एकदम से ही आँखों पर जैसे यकीन ही नहीं हुआ ..पर दूसरे ही क्षढ़ मन जैसे गर्व से भर उठा, यह सोच कर कि, हिंदी की चादर विश्व को कितनी ज्यादा ढांप चुकी है. भारत में अंग्रेजी की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद आंकड़ों के हिसाब से हिन्दी बोलने वालों की संख्या दुनिया में आज तीसरे नंबर पर है। और इसका श्रेय उन सभी रचनाकारों, और हिन्दी प्रेमियों को जाता हैं...जो विदेश में रहते हुए भी भारत को अपने साथ जीवित रखे हुए हैं और हमेशा रखना चाहते हैं. इसमे सबसे चुनोतीपूर्ण कार्य है ...हिन्दी के प्रचार और प्रसार का..जिसके चलते अमेरीका के अलग -अलग शहरों में कई हिन्दी सेवी संस्थाएं है..जिसमे एक सम्मानित संस्था का नाम है कैलिफोर्निया, बे-ऐरिया की, “विश्व हिन्दी ज्योति “..जिंसकी स्थापना साहित्यकार डॉ अनीता कपूर, प्रोफेसर नीलू गुप्ता, कलाकार शोनाली श्रीवास्तवा, प्रोफेसर प्रांजलि और लेखिका मंजु मिश्रा जी ने मिल कर की... संस्था की जन-संपर्क अधिकारिणी के तौर पर भी कार्यरत डॉ अनीता कपूर अपने पूरे योगदान से संस्था को आगे बढ़ाने में जुटी है। “विश्व हिन्दी ज्योति का मुख्य लक्ष्य हिंदी को विश्व स्तर की भाषा का दर्जा दिलाना है और कार्यकारिणी के सभी सदस्य हिंदी की उन्नति के लिए कार्यरत हैं और हिंदी के साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास के लिए भरपूर कार्य कर रहे हैं। संस्था का हर संभव प्रयास रहता है की हिन्दी को आगे बढ़ाने और खासकर बच्चों के लिए और उनकी रूचि को हिन्दी में पैदा करने के लिए, कुछ ऐसे कार्यकर्म तैयार किए जाएँ जिससे कोई भी क्षेत्र अछूता न रहे....चाहे वो सांस्कृतिक हो या फिल्मी, धार्मिक हो या फिर कोई त्योहार।

हिन्दी तो बहुत से संस्थाएं पढ़ाती हैं...पर “विश्व हिन्दी ज्योति” की सोच और लक्ष्य थोड़ा अलग होने से ...संस्था का पहला नैतिक कर्तव्य हमेशा होता है कि ....बच्चों में हिन्दी के प्रति प्रथम भाषा का भाव जगे और वो स्वत ही भाषा के प्रति जागरूक हों...और इसके चलते संस्था एक सरहनीय कदम यानि, ई-पत्रिका शुरू करने जा रही है....जिसमे बच्चों द्वारा रचित रचनायों का भी एक सेक्शन होगा...जिससे बच्चों में कला और साहित्य के प्रति रूचि को आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त होगा।

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।

- भारतेंदु हरिश्चंद्र

हमने दुनिया को वैसे भी काफी कुछ दिया हैं शुन्य से लेकर दशमलव तक, गढ़ित से लेकर कालगढ़ना तक. ऐसे ही अब हिंदी की बारी है. हिंदी भाषा तो बहुत सरल है. हिंदी भाषा और साहित्य को को बढ़ावा देने के लिए संस्था समय-समय पर काव्य-गोष्टी का आयोजन, त्योहारों पर विशेष कार्यकर्म आयोजित करती रहती है। इस नए वर्ष में कवि सम्मेलन आयोजित करने की भी योजना है।

संस्था की अध्यक्षा शोनाली जी का कहना है कि ,”हमारी चेष्टा होगी कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी की दिलचस्पी हिंदी में बढ़ा सकें ताकि हमारे बच्चे न सिर्फ हिंदी को दादा-दादी से वार्तालाप करने का एक ज़रिया समझें बल्कि इसकी साहित्यिक पराकाष्ठा को भी छू सकें”।

संस्था की जन-संपर्क अधिकारिणी डॉ अनीता कपूर का कहना है कि, उन्हें जहां इस बात की ख़ुशी है कि , विदेशों में हिन्दी की महत्ता पिछले सालों में काफी बढ़ी है, वहीँ इस बात का दुःख भी है कि भारत में नयी पीढ़ी पर अंग्रेजी का भूत चढ़ रहा है. कहीं ऐसा न हो कि विदेशों में हैसियत हासिल कर रही हिन्दी खुद भारत में उपेक्षित हो जाए.

भाषा, संस्कृति और धर्म एक त्रिकोण हैं और हमेशा ही जुड़े रहते हैं . विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय अपने देश से कभी दूर नहीं हो पाए. यह त्रिकोनी देशी महक हमें यहाँ हमेशा ही महकाती रहती है. और यह त्रिकोनी पवित्र हवन कुंड जलता ही रहेगा जब तक प्रयास रुपी हवन सामग्री इसमें डलती रहेगी, ऐसी “विश्व हिन्दी ज्योति” की कामना है.

3 blogger-facebook:

  1. “विश्व हिन्दी ज्योति" संस्था के बारे में जान कर अत्यंत खुशी है...हम भी अपनी भारतीय भाषा हिन्दी के उत्कर्ष के लिए कार्य कर रही इस संस्था के प्रति अपना आभार प्रकट कर रहे है!....डॉ.अनीता कपूर एवं अन्य माननीय सदस्य अपने उद्देश्य में ज्वलंत सफलता हासिल करें...यही हार्दिक शुभ-कामना!

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  2. "कहीं ऐसा न हो कि विदेशों में हैसियत हासिल कर रही हिन्दी खुद भारत में उपेक्षित हो जाए."
    आपका संशय निराधार नहीं है। शिक्षिका हूँ देख रही हूँ कि हिन्दी को कमतर समझा जा रहा है। अंग्रेज़ी को हर तरह से सम्मान और तरज़ीह दी जा रही है। बच्चों की मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति पंगु हो रही है।
    हर्ष की बात यह है कि हमारे विद्यालय में हिन्दी को बहुत सम्मान दिया जाता है किंतु बच्चों को तो पश्चिमी संगीत, भाषा और संस्कृति ही लुभा रही है।
    आपके प्रयासों को साधुवाद अनिता जी।

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