शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

लाल्टू की कहानी - बेवकूफ

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ज सुबह से उसे उदासी का दौरा पड़ा हुआ था। मायूस एक चेहरा लादे वह दफ्तर में कागजों को इधर-उधर करता रहा। कुछ भी करने में मन नहीं लग रहा था। एक तो इतनी गर्मी, बदन पसीने से तर मालूम होता, पर चमड़े पर हाथ रखता तो देखता कि केवल एक फिसलन सी है, पानी तो उड़ता जा रहा था। अजीब सा अकेलापन उसे देर से घेरे हुए था। यह एक ऐसी उदासी थी, जिसमें न तो किसी के साथ बैठने को मन कर रहा था, न ही अकेले पड़े रहने का।

किसी तरह समय काटते हुए जब उसे लगा कि शायद खाने का वक्त हो ही गया होगा, वह कमरे से निकल आया और हाल में लटकी दीवाल-घड़ी पर उसने देखा , कि अभी केवल बारह बजे थे। कायदे से उनका लंच- आवर साढे बारह से शुरू होता है, पर वह निकल ही पडा।

सड़क पर चलते हुए वह पूरी कोशिश करता रहा कि वह मकानों के बिलकुल करीब से चले, ताकि धूप कम से कम लगे। सूरज सिर के ऊपर था और वह धूप से बच नहीं पा रहा था। गली के मोड से निकल पार करते हुए वह शांति ढाबा की ओर बढ़ा। दूर से ही वंदना वाजपेयी की आवाज उसके कानों तक पहुंच रही थी। उसने कोशिश की कि गीत की कोई कड़ी वह भी गुनगुनाये, पर उसका दिमाग जैसे सुन्न सा था।

ढाबे में आकर एक टेबल पर वह बैठा ही था कि उसकी नजर सामने वाले टेबल पर बैठे किसी व्यक्ति की आँखों से टकरायी। वे लाल थीं। आँखों के नीचे काले गड्ढे थे, पर नाक तमतमा रही थी। दो-तीन दिनों से दाढ़ी नहीं बनायी गयी थी और होंठों के बीच दिखते दांत उसकी ओर कठोरता से ताक रहे थे। उसके तीन साथी धड़ाधड खाना जा रहे थे, जैसे किसी खजाने से धन उठाकर मुंह की जेब में डाल रहे हों। पता नहीं वह आदमी क्यों वैसा ही भुक्खड नहीं था। वह आदमी उसकी ओर कठोरता से देखता रहा। फिर धीरे- धीरे उसकी आँखों में शैतानी भरी एक मुस्कान तैर आयी। तभी ढाबे का वेटर मनोहर उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसने दाल और सलाद कहा। मनोहर के जाते ही वह उठकर बगल की मेज पर से अखबार उठा लाया। पर अखबार पर नजर डालते ही उसे लगा कि वह कुछ भी पढ़ नहीं पायेगा। आजकल अखबारों में होता ही क्या है सिरदर्द के सिवा?... अगली टेबल वाला वह व्यक्ति चीखकर अपने साथियों से कह रहा था, '' लो बे भुक्खड़ों! मादर**! खा लो सालों - तुम लोग भी क्या कहोगे कि फत्तू ने खिलाया था - जाओ कितना खा सकते हो! अबे ओ छोकरे! ला इधर ला शाही पनीर और..'' उसकी नजरें फिर उनकी ओर उठीं। अब फत्तू नामक वह आदमी भी खाने लगा था। अचानक उसे अहसास हुआ कि वे सब पिये हुए हैं। वे देखने में गरीब लग रहे थे। कहां से मिल होंगे इतने पैसे उन्हें? कहीं से चोरी-वोरी करके लाये हैं क्या? वह सोचता रहा। इतना बढिया खाना तो वह भी कभी-कभी ही खा सकता है! और यह आदमी अकेला अपने खर्च से सबको खिला रहा है? कुछ गडबड जरूर है।

अचानक फत्तू उसकी ओर देखकर मुस्कराया। उसने सिर नीचा कर अखबार पढ़ने का बहाना किया पर फत्तू ने पतली सी आवाज में व्यंग्य से कहा, '' हल्लो! गुड मार्निंग!'' उसके मन में उत्तेजना की एक लहर दौड़ गयी। पर वह शांत रहा और न सुनने का बहाना करता रहा। वह आदमी अपने साथियों से कह रहा था, '' सालों! तुम लोगों को कैसा बढिया होटल में लाकर खाना खिलाया है - देखो भैनचो... कैसा साहब लोग आकर यहां खाता है। ''

उसे ऐसा महसूस होने लगा जैसे कोई उसके खाने में गंदी चीजें डाल रहा हो। बडी मुश्किल से वह अपने- आपको शांत रख पा रहा था। तभी फत्तू से उसके एक साथी ने कहा, '' अबे छोड! याद है तेरे को, जब बंबई में ईरानी होटल में मुर्गा खाया था अपुन! वो जब छिब्बू के घर में छिपे रहे सब जाकर! बाद में सब.. ? '' उसकी बात काटते हुए फत्तू बोला, '' अबे तेरे को मुर्गा ही खाने का था तो तू पहले क्यों नहीं बोला! चल अभी...'' कहकर वह उठ पड़ा। उसके साथी पहले जैसे खाते रहे। फिर फत्तू बोला, '' यार! तू इस साब के सामने मेरे को ऐसा बेइज्जत कर रहा है - साले, क्या समझा क्या है तू?''

वे लोग हंस रहे थे। उनमें से एक ने कहा, '' अबे बैठ!''

फत्तू बैठ गया। अचानक वह जोर से हंस पड़ा फिर आंखें नीची करते हुए बोला, '' साले उस बार बुरी तरह फंस गया था यार!''

'' क्या हुआ था बे?''

'' अरे! वो जो इक्कू सेठ है न?'' उसकी आंखें और अधिक लाल हो गयी थीं। '' साले को एक दिन मैं कच्चा चबा जाऊंगा, उस हरामी के घर मेरी मां काम करती थी यार। तो उसके यहां चोरी हो गयी और पुलिस आ गयी साली मेरे को पकड्ने। मां को भी पकड़कर पीटा। मैंने तो चाकू चला दिया होता, वो तो मां ने रो- धोकर मुझे बंबई भागने को मजबूर कर दिया। ''

उसके दूसरे साथी हंस रहे थे। ऐसी गंभीर बात पर भी लोग हंस रहे थे। अचानक उसकी ओर देखकर फत्तू बोला, '' ऐ पढा-लिखा बाबू बडा बोर हो रहा यार!... साला पढ़ा-लिखा आदमी दाल रोटी खा रहा है और तू भुक्खड़ लोग ऐश कर रहा है!''

उसे खुद पर गुस्सा आने लगा था। वह उनकी बातें सुनने में इस तरह खो गया था कि उसे पता भी न चला था कि मनोहर कब दाल की प्लेट और दो फुलके रख गया था। वह अब खाने लगा था। मन-ही-मन उसे लग रहा था कि इस साले फत्तू को जाकर दो थप्पड़ मारूं। पर न तो उसमें इतनी ताकत ही थी और न ही वैसी स्वाभाविकता। मन-ही-मन कुढते हुए वह खाता रहा। मनोहर ने अब सलाद भी: लाकर रख दिया था।

उनमें से एक अब कह रहा था, '' यार! अब खाने. के बाद चलके जरा और भी जाये - आज का दिन ऐश किया जाय। ''

उसकी तकलीफ बढती जा रही थी। उसने सोचा कि इन्हीं लोगों को वह सडक पर देखता तो उनके प्रति उसकी भावनाएं कितनी अलग होतीं। इनको भ्री वह अपनी दुनिया में एक जगह देता, जहां न्याय- अन्याय का द्वंद्व छिड़ा हुआ है। पर अब उनके मैले चेहरों, फटे-चिथड़े कपड़ों को देखकर भी उसे कोई सहानुभूति नहीं हो रही, थी।

देर तक उनकी बातें उसे सुननी पडी। जल्दी खा लेने की जैसे उसमें ताकत ही नहीं थी। वे लोग भद्दी- भद्दी आवाजें निकालते रहे, गालियां देते .रहे। उसको फत्तू ने और नहीं छेड़ा, पर उसका गुस्सा उन पर बरकरार था। अचानक फत्तू ने कहा, '' सालो, आज पांच सौ रुपयों का बिल देना है - खा, तू लोग - क्या चाहिए तेरे को.. .पानी? धत् तेरे की.. .अबे ओए! ला, पानी ला - एक घड़ा लाकर रख यहां पर - आज खूब जायेंगे-पियेंगे, देख लो सालो - हम भुक्खड लोग कितना खा-पी सकते हैं!'' उनका खाना हो गया था। फत्तू ने बिल लाने को कहा। मनोहर ने आकर बतलाया कि पैंतालीस रुपए हुए हैं। उसने फिर भी बिल मांगा। सामने मिठाई के काउंटर पर बैठे मालिक ने जोर से कहा, '' बिल-विल हम नहीं देते! पैंतालीस रुपए दे जाओ!'' फत्तू ने जेब से पैसे निकाले और नोटों को गिनते हुए वह बोला, '' साली अपनी बेटी के लिए ये पैसे रखे थे यार! वह भी बेवकूफ अजीब सपने देखती है; अभी स्कूल जाती है न - उसकी एक किताब में इंदरा गांधी के बारे में लिखा है. - तो उसकी भी जिद हो गयी है कि वह इंदरा गांधी बनेगी...''

उसका कौर मुंह में ही रुक गया। उसने नजरें उठाकर उनकी ओर देखा। फत्तू हंस रहा था, '' साली बेवकूफ है यार! उसको क्या मालूम - बच्ची है न...'' '' बड़ी होकर तो झाडु लगायेगी साली,'' उसकी एक साथी ने कहा। बाकी दो जैसे कहीं खोये हुए से शून्य में ताकने लगे थे।

फत्तू अब चीख पड़ा '' क्यों बे, झाडू क्यों लगायेगी? अपुन वहां गंदा काम क्या इसलिए करता कि मेरी बेटी बडी होकर तेरी मां की तरह झोपडी में रंडीगिरी करेगी?''

पर वह दूसरा साथी चुप था। उसे बड़ा अजीब लगा, उसने सोचा था कि अब इनकी लड़ाई होने वाली है पर कुछ नहीं हुआ। वे लोग उठकर जाने लगे थे.। फत्तू ने एक बार जोर से कहा, '' साली, बेवकूफ, अभी से इदरा गांधी बनने का खाब देखती है। हरामजादी ने दो किताबें क्या पढ़ लीं, अपनी औकात भूल गयी!'' जाते हुए फत्तू ने उसकी ओर देखा और हंसकर बोला, '' क्यों साब! हाउ आर चू!'' वह भी पता नहीं क्यों हंस पडा। वे लोग शोरगुल मचाते चले गये। उनके जाने के बाद ढाबे का मालिक उसके पास आया और बोला, '' साब! आपको बुरा लगा होगा, हमको पहले पता होता कि इतनी बदतमीजी करेंगे तो हम कभी खाने को नहीं बैठने देते, पर अब बैठ गये तो उठाने को अच्छा भी नहीं लगता। ''

उसने बड़ी शांति से पूछा, '' कौन हैं वे लोग? यहां के तो लगते नहीं। ''

मालिक ने कहा, '' नहीं, यहीं के हैं - ये जो पीछे कंजरों की बस्ती है न - वहीं से हैं!''

'' कंजर कोई जात है क्या?''

'' बस, ऐसा ही समझो आप तो - बदमाश हैं सब!''

'' इतना पैसा कहां से मिलता है इनको?''

'' शराब का धंधा करते हैं न साब! वैसे चोरी-चमारी भी करते है - लगता है आज बड़ा हाथ लगा होगा सालों के! स्मगलिंग वगैरह भी. करते हैं - कुछ तो बंबई-बुंबई भी धूम आये हैं। ''

लौटते वक्त वह उस बच्ची की बातें सोचता रहा, जो इस देश की प्रधानमंत्री बनना चाहती है। '' सचमुच, कितनी बेवकूफ है!'' उसके मन में भी एक ख्याल उभरा।

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