गुरुवार, 26 जनवरी 2012

अरविंद कुमार की दो कविताएँ

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मैं गुलाब हूँ
मैं गुलाब हूँ
मुझमें है बहुत खुशबू
यह किसको नहीं पता,
खुद दुख दर्द सहकर
दूसरों को खुशबू देता हूँ।


तोड़ लेते हैं मुझे
बड़ी बेदर्दी से
नहीं तरस आता है
मुझ पर उन्‍हें
जरा पूछो मेरे दिल से
क्‍या मेरे दिल पे
गुजरती है
आँसुओं के घूँट पीकर
खुद को सँभलता हूँ।


आँसुओं को पीकर
शूलों का साथ निभाता हूँ
हर घड़ी में सुख-दुख में
साथ देता हूँ
मैं गुलाब हूँ।
कोई तोड़ने आता है मुझे
मैं चिल्‍ला कर कहता हूँ
मुझे मत तोड़ो
मुझे दर्द होता है,
पर क्‍या करूँ।
इस दर्द को
कोई सुनता नहीं।


बनमाली आकर
मुझे तोड़ लेता है
सदन ले जाता
सदन ले जा करके
वहीं माला पिरोता,
वहीं मुझे
देवी-देवताओं पर चढा़ता
मुझे कहीं
बेदर्द होकर
बेंच देता !
मुझ पर उसे करूणा का
भाव ही नहीं आता

वह भी बिचारा क्‍या करे
उसकी भी लाचारी
और मजबूरी है
मुझसे मित्रता करेगा
तो पेट कैसे भरेगा
प्रेमी तोड़ लेते
प्रेमिका केशों में गूँधती है।
आखिर मैं तरह-तरह के
दुख सहकर
दुनिया को खुशबू
प्रदान करता हूँ,
आखिर मैं गुलाब हूँ।


नहीं छोड़ूँगा
साथ दुनिया का
जब तक साँसों में सांस है।
नहीं कष्‍ट है मुझे अपनी जिन्‍दगी के लिये।
मैं गुलाब हूँ
अर्पित कर दूँगा
तन मन से
जिन्‍दगी अपनी दूसरों के लिए
यही है मेरा ध्‍येय,
यही है आरजू मेरी।

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जो फूल नहीं जग में

जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम
जब खिल जाए
फूलों सा चमन
चमन में फैल जाय महकती
चारों दिशाए।
जब बहें पवन सुंगन्‍धित
मलय समीर चारों ओर से।
दुनिया में रहे
हिन्‍दू, मुस्‍लिम, सिक्‍ख और
इसाई रहे सदा प्रेम से।
न कोई करे
किसी की जग हँसाई
ओ फूल बनने का संदेश देगे।
टहनियों में काँटों की
लटक-लटककर वट की शाखाओं को
सौम्‍य सुशोभित करता हूँ।

दुखों का दर्द सहन कर
हम फूल बनेगें,
इस जग की शान बनने को,
उस डाली से हमें प्रीत मिले
जो फूल नहीं जग में,
ओ फूल बनेगें हम।

सूरज करता रोशनी जग में,
जिससे मिट जाता अन्‍धकार
विश्‍व वसुन्‍धरा के तन से,
अपने प्रकाश के शशि को
निशा में एक दीप सा
प्रज्वलित कर देता है।
और निशा बन जाती
स्‍वच्‍छ चाँदनी की अनमोल
धरोहर पूनम सी।

वैसे बनकर हम
इस जग में
फैलाएंगे महक को
इस संसार में,
जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम ।

छा जाए गगन में
छा जाए मलय समीर में,
छा जाए इस मिट्‌टी के कण-कण में,
ओ सुंगन्‍धित फूल बनेगें डाली के,
जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम।

चारों दिशा में होगी शान्‍ति- शान्‍ति,
दुख की टाटी टूटेगी,
सुख की लहर आयेगी,

जैसे -
गँगा, जमुना, सरस्‍वती
हर-हर करके निकलें
पर्वतराज की गोद से,
करे मुक्‍त अपवित्रता को,
हम बनकर फूल
उस डाली के
अपवित्रता को दूर करके
पवित्रता को जग में लाएगें,
बहेगी चारो दिशाओं में पावनता।

जैसे -
बहें हिमालय की पवन
चारों दिशाओं में
बहा ले जायेगी
अपने साथ ये
बेरस पवन और लायेगी
चहुँदिश मधुरस पवन सा झोंका॥

फूल बनकर उस डाली करेगें
एक नवयुग का नव निर्माण।
जो फूल नहीं जग में
ओ फूल बनेगें हम।

उस युग में नई चेतना विकसित होगी।
जैसे -फूलेगें फूल हर डाली में
न कोई नीरव नीरस होगी,
न कोई लता बिना पुष्‍प की होगी,
न कोई डाली सूखी होगी,
हरी और हरियाली हर डाल होगी,
खुशहाल होगी हर-हरी डाल,
जो फल नहीं जग में,
ओ फूल बनेगें हम।

नव युग की नई
चेतना का विकास होगा,
इस युग में न कोई
तोड़ेगा डाली के फूल।

डाली से अलग होने पर
मुरझा जाते हैं फूल,
नव युग की नई चेतना में
कोई फूल नहीं मुरझा पायेगा,
जब नहीं तोड़ पाएगें फूल,
तब क्‍यों मुरझाएगें फूल ?
उस नवयुग के नये
फूल होंगे ऐसे।
जैसे सर में खिले
जंगल का फूल।

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Dr.arvind kumar
Assistant Profeser
Government Girls Degree College Dhindui Patti-Pratapgarh
U.P.
Mo.9451143511
drdivyanshu.kumar6@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. अरविन्द भैया आप ने बहुत ही सुन्दर लिखा है मज़ा अ गया.

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