शशांक मिश्र भारती की कविता - चादर

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सरदी के कठोर मौसम में

झूम रहा है

एक झाड़ी के मध्‍य

मग्‍न हुआ मेरा मन,

देख रहा हूं

हिम से ढके उस मैदान को।

 

मैं अकेला दुःखियों का प्रिय

शोक-सन्‍ताप से दूर

इस मैदान में

बहाता नहीं आंसू

व्‍यर्थ के,

न सोचता हूं

आगे की और-

न बीते अतीत की,

देख रहा हूं-

हिमावरण से निर्मित-

उस श्‍वेत चादर को।

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सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0

ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

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1 टिप्पणी "शशांक मिश्र भारती की कविता - चादर"

  1. एक ऐसी रचना ..... जो कि मन को झकझोर दे..

    धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

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