शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

पुस्‍तक समीक्षा : दलितों का दर्द उकेरती कविताएं

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पुस्‍तक समीक्षा

दलित अश्रु

कवयित्री - प्रियंका वैद्य

समीक्षक - अनन्‍त आलोक

दलितों का दर्द उकेरती कविताएं

स्‍त्री विमर्श और दलित विमर्श आज के दौर के सबसे महत्‍वपूर्ण एवं हॉट विमर्श में माने जाते हैं। भले ही कुछ लेखकों ने इन विमर्शों का सहारा केवल स्‍वयं को ऊँचा उठाने के लिए सोपान के रूप में लिया हो लेकिन कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो वास्‍तविक रूप से चिंतित हैं। जो जमीनी हकीकत को सामने लाकर एक से एक नये रहस्‍योद्घाटन कर जमीनी हकीकत को सामने लाने में जुटे हैं या यूं कहें वे इन विमर्शों से वास्‍तव में प्रभावित हैं।

ऐसी ही एक लेखिका हैं प्रियंका वैद्य । राजकीय महाविद्यालय नालागढ़ , हिमाचल प्रदेश में अंग्रेजी की प्राध्‍यापिका प्रियंका वैद्य साहित्‍य में विशेष रूचि रखती हैं। यहां समीक्षित पुस्‍तक दलित अश्रु इनकी दूसरी पुस्‍तक है। इनकी पहली पुस्‍तक voices from the margins दलित विमर्श पर शौधकार्य है। दलित विमर्श में कवयित्री की चिंता साफ परिलक्षित होती है। संग्रह की पहली ही रचना में वह नायक को मुखरित करते हुए कहती हैं 'एक आसमां/एक धरा/वही शरीर/ वही मांस, वही खून और सांसे/फिर भी भिन्‍नता क्‍यों ?

साधारण और आम जनमानस की भाषा में कवयित्री कहती है ‘ उन्‍हीं की साफ की हुई ड्‌योढ़ी पर लोग रगड़ते हैं जबीं और उन्‍हें देखते ही सिकुड़ जाती है नाक'। प्रियंका की कविता में उपेक्षित और घुटन भरी जिंदगी से आक्रोशित दलित क्रांतिकारी हो उठता है। और सत्‍य को ही नकारते हूए कहता है ' कहां है सत्‍य/ रहता है बंजारों सा / न ही पांव है / न ही सिर / कैसे कल्‍पना करें उसकी ? उसे नग्‍न रूप में लाओ धर्म के सोदागरों के चोलों से''।

कवयित्री ने जिस कुशलता के साथ दलित के दर्द को उकेरा है उसी कुशलता से समाधान भी सुझाया है 'निराशा और हताशा में तुम अपने अंश को केवल इस लिए समाप्‍त नहीं कर सकते कि उसे घृणित जीवन न जीना पड़े जबकि वही कल खड़ा हो सकता है इस बुराई के विरुद्ध देखिए ' खत्‍म कर देना चाहता था वो/ एक अछूत का अंश / परंतु वह खड़ा कर सकता था/ एक क्रांतिकारी / जो लड़ सके इस प्रथा के विरूद्ध।

एक कविता में तो कवयित्री ने जो रहस्‍योदघाटन किया है उसे पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं देखिए 'जन्‍म हुआ तो/ उसके बाप ने उसका एक पांव एक हाथ / काट दिया / बड़ा होने पर वो समझ पाया/ दी गई विकलांगता का महत्‍व/ अब वो मांग सकता था भीख। इनके अलावा बहुत सी अच्‍छी कविताएं हैं। कहीं कहीं कविता में अस्‍पष्टता का दोष उत्‍पन हो गया है। आगे समय के साथ स्‍वतः सुधार होगा । कुछ कविताओं में अतिश्‍योक्‍ति भी हुई है। कुल मिलाकर संग्रह अच्‍छा बन पड़ा है। और संग्रहणीय है।

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पुस्‍तक ः दलित अश्रु

लेखिका ः प्रियंका वैद्य

मूल्‍य ः 195 रु

प्रकाशक ः राहुल पब्‍लिशर्स एंड किस्‍ट्रीब्‍युटर्स , नवीन शहादरा, दिल्‍ली

3 blogger-facebook:

  1. श्रधेय रवि जी पुस्तक समीक्षा प्रकाशित करने के लिए हार्दिक आभार | एवं पुस्तक की लेखिका प्रियंका वैद्य को बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  2. उत्तर
    1. श्री अरुण चंद राय जी का हार्दिक आभार |

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