रविवार, 5 फ़रवरी 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' के नवगीत

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नवगीत 1

लबरी-जबरी नूरा-कुश्ती,

अब जनमन को नहीँ सुहाती.

 

क्योँ उपमेय नहीँ हैँ आश्रित

जबर-जटिल उपमानोँ के,

क्योँ होते हैँ पुनर्परीक्षित

मिथक आज भगवानोँ के.

 

फेँको गुठली चूस चुके रस

सीधी बात समझ यह आती.

क्या अभिप्राय-अर्थ बूझेँ जब

है सब कुछ ही खुल्लमखुल्ला

संत-महंत हुए बाजारू,

छली-फ़रेबी काज़ी-मुल्ला.

 

मार-मार पुरखोँ की पनहीँ,

मूछ मरोड़ेँ पोते-नाती.

 

नवगीत  - 2/                  
 रोशनी की चौँधियाहट मेँ                               
 ~*~          
 मुफ़्त बाँटेँ मौसमी मज़मे            
 तिलस्मी गोलियाँ ;  
पोस्टर, बैनर ये नारे               
हाँकते बड़बोलियाँ।  
   
कामचोरोँ ने पहन लीँ         
 पुनः पैतृक पादुकाएँ,      
बन हितैषी शीश धर लीँ,  
दीन-दुखियोँ की बलाएँ;    
रच रहे जनगण मनआँगन     
मोहिनी रंगोलियाँ ।   
    
रोशनी की चौँधियाहट मेँ     
हुई हर आँख गाफ़िल,    
 भीड़-भभ्भड़, शोर मेँ है   
सुजन की पहचान मुश्किल  
खुद कहारोँ ने ही लूटीँ             
हैँ बारातेँ- डोलियाँ ।  
 
परिचय-  
               देवेन्द्र कुमार पाठक (तख़ल्लुस 'महरूम')          जन्म -02.03.1955;ग्राम-भुड़सा,  ( बड़वारा )जिला-कटनी, म. प्र.में;शिक्षा-M.A.B.T.C.( हिंदी/अध्यापन)प्रकाशित पुस्तकेँ-'विधर्मी', 'अदना सा आदमी' (उपन्यास) 'मुहिम', 'मरी खाल:आखिरी ताल','चनसुरिया का सुख','धरम धरे को दण्ड' (कहानी संग्रह )'दिल का मामला है'( व्यंग्य संग्रह ) 'दुनिया नहीँ अँधेरी होगी' (गीत-नवगीत) व्यवसाय-अध्यापन; संपर्क- प्रेमनगर,खिरहनी.साइन्स कालेज डाकघर,कटनी 483501 म.प्र. ई मेल- devendra.mahroom@gmail.com 

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