शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

पंकज दीक्षित की कविता - मैंने सोचा पुकारोगी, दुलारोगी, खिलाओगी...

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मैंने सोचा

पुकारोगी, दुलारोगी, खिलाओगी।

 

अभी मैं घर जो आउंगी

मुझे गोदी सुलाओगी॥

मुझे चलना सिखाओगी

मुझे पलना झुलाओगी।

 

मैंने सोचा

पुकारोगी, दुलारोगी, खिलाओगी॥

 

कभी डांटा अगर तूने

तो तुझसे रूठ जाउंगी।

बनूंगी पापा की बिटिया

न तेरे पास आउंगी॥

 

मेरे गुस्‍से पे तेरा मुस्‍कराना

छिप के देखूंगी।

मैं तेरा दूर से गुड़िया दिखाना

छिप के देखूंगी॥

 

मैं गुड़िया देख के, गोदी में तेरी

दौड़ी आउंगी।

सिमट के तेरे आंचल में

जहां दोनों मैं पाउंगी॥

 

अभी डांटा नहीं मुझको

अभी देखा नहीं तूने।

मगर तू मुझसे क्‍यों रूठी

खता की कौन सी मैंने॥

 

मुझे जन्‍मा नहीं तूने

मुझे ज्‍याया नहीं तूने।

तो एक उम्‍मीद जीवन की

भला फिर क्‍यों दी माँ तूने॥

 

मेरे पंखों को तू मैया

अगर आकाश दे देती।

मैं बनती कल्‍पना तेरी

या बनती एक किरन तेरी॥

 

मुझे जन्‍मा नहीं तूने

मुझे ज्‍याया नहीं तूने।

तो एक उम्‍मीद जीवन की

भला फिर क्‍यों दी माँ तूने॥

 

अगर होता रहा एैसा

तो हर भैया ये पूछेगा।

ये राखी चीज क्‍या होती है

उसके कौन बांधेगा॥

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