न होने पर भी
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मैं धर्मराज नहीं/युधिष्ठिर नहीं मैं
मैंने पांसे नहीं फेंके /जुआ नहीं खेला
दांव पर नहीं लगाया कुछ
पर मेरी द्रौपदी छिन गई/
उठा ले गया उसे बाजार/दिलाने को साड़ियां
और करता रहा चीरहरण-
करोड़ों की तरह/मैं भी
उतरा नहीं युद्ध में कभी/
मैंने किसी को नहीं ललकारा/
आग बर्बादी और मौत उगलते
जीवन निगलते
बमों का सामना नहीं किया
पर हो गया लुंजपुंज/बाहर आ गईं
अंतड़ियां मेरी भूख से/
सूख गया भीतर तक प्यास से-
मैं योद्धा नहीं कहलाया/
पर मारा गया बार बार/लड़ते हुए
थोपे हुए/अनचाहे युद्ध -
नहीं था कुछ मेरे पास /
सिवा हाथ-पांव के
पर मैं/लुटता रहा /
पिटता-कुटता रहा/
सबसे ज्यादा-
पूरी करने कामेच्छा अपने पिता की/
मैंने नहीं की थी भीष्म प्रतिज्ञा/
पर मैं होता रहा लगातार
निर्वासित-
नहीं था मैं पांचाली पुत्र/
मेरा पिता नहीं कर कर रहा था/
साम्राज्य के लिए युद्ध/
मैं चक्रव्यूह भेदने नहीं गया/
पर महारथी मेरा वध करते रहे-
विश्वामित्रों ने मुझे बना दिया/त्रिशंकु
लटका दिया अधर में
सदा की तरह देवता /
मुझे स्वीकार नहीं करते
अपने स्वर्ग में
और मंत्रशक्ति मुझे नहीं उतरने
देती है धरती पर
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