नरेन्द्र तोमर की कविता - न होने पर भी

न होने पर भी

मैं धर्मराज नहीं/युधिष्‍ठिर नहीं मैं

मैंने पांसे नहीं फेंके /जुआ नहीं खेला

दांव पर नहीं लगाया कुछ

पर मेरी द्रौपदी छिन गई/

उठा ले गया उसे बाजार/दिलाने को साड़ियां

और करता रहा चीरहरण-

करोड़ों की तरह/मैं भी

उतरा नहीं युद्ध में कभी/

मैंने किसी को नहीं ललकारा/

आग बर्बादी और मौत उगलते

जीवन निगलते

बमों का सामना नहीं किया

पर हो गया लुंजपुंज/बाहर आ गईं

अंतड़ियां मेरी भूख से/

सूख गया भीतर तक प्‍यास से-

मैं योद्धा नहीं कहलाया/

पर मारा गया बार बार/लड़ते हुए

थोपे हुए/अनचाहे युद्ध -

नहीं था कुछ मेरे पास /

सिवा हाथ-पांव के

पर मैं/लुटता रहा /

पिटता-कुटता रहा/

सबसे ज्‍यादा-

पूरी करने कामेच्‍छा अपने पिता की/

मैंने नहीं की थी भीष्‍म प्रतिज्ञा/

पर मैं होता रहा लगातार

निर्वासित-

नहीं था मैं पांचाली पुत्र/

मेरा पिता नहीं कर कर रहा था/

साम्राज्‍य के लिए युद्ध/

मैं चक्रव्‍यूह भेदने नहीं गया/

पर महारथी मेरा वध करते रहे-

विश्‍वामित्रों ने मुझे बना दिया/त्रिशंकु

लटका दिया अधर में

सदा की तरह देवता /

मुझे स्‍वीकार नहीं करते

अपने स्‍वर्ग में

और मंत्रशक्‍ति मुझे नहीं उतरने

देती है धरती पर

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