गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

कुमार अरविंद के हाइकु व कविताएँ

(नया! - अब आप अपनी प्रिंट मीडिया में पूर्व प्रकाशित स्कैन की हुई रचनाओं को भी रचनाकार में प्रकाशित करवा सकते हैं. रचनाएँ 600 डीपीआई में स्कैन करवा कर जेपीजी [jpg] फ़ाइल में हमें प्रेषित करें. निम्न रचनाएँ स्कैन कर इमेज रूप में ही प्रेषित की गई थी जिसे यहाँ डिजिटाइज़्ड कर यूनिकोड में प्रकाशित किया जा रहा है)

हाइकु

मायूस चेहरा
मुरझाई फसल,
सूली पर लटके ।

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प्यार का दर्द?
जिन्दगी का नासूर ।

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चिल चिलाती धूप
नये अनाज की महक
नये स्वप्नों का आना ।

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जब तुम थे
तुम्हारी दुनिया थी.
अब मैं हूँ
मेरी दुनिया है '

---.

रिश्ते

जिन्दगी
पलपल
टुकड़ों में
बंटती जा रही
खामोश होती निगाहें
मौत का आईना दिखा रही हैं
हर तरफ
लालच और मक्कारी है
लोग बेईमान होते जा रहे है
रिश्ते गिरगिट की तरह
रंग बदल रहे
जो धडकनों में बसते थे
ओज बेवजह
दुश्मन बन गए ।
हर तरफ
आतंक का साया है
सीमाएं लांघ कर देखो
न हम सुरक्षित
न हमारे रिश्ते ।
जिधर भी
आँख उठाकर देखो
लोग मुर्दा नजर आते हैं ।
जिदगी
दूर तलक
तेजाब ही तेजाब
नजर आती है ।
कोई सोचे
या न सोच
पर मैं सोचता हूँ
पास बैठा शख्स
चोर या बदमाश
नजर आता है
पर ऐसा भी नहीं
हर कोई चोर या बदमाश हो
काटा
जिसे चुभता है
उस कांटे की चुभन का दर्द
वही जानता है
जिसे कभी कांटा चुभा नहीं
उन्हें क्या पता?

--

एहसास करा दूंगा

मेरा मचलता मन
बेरहम हाथों में
अगुलियाँ जकड लेती है कलम
रिसने लगती है कलम
कायदे- बेकायदे
उठाती है सवाल
दर्द की नीली पर्त
कभी आंखों में
भर लाती है रक्तवर्ण
जिसे मैं कभी
भरकर नहीं लाना चाहता
जो आ जाता हैं अनायास
क्योंकि
मैं प्रतिशोध
लना नहीं चाहता
ऐसा नहीं है
कि मैं पतिशोध लेने में कमजोर हूँ
मैं उसके
अंतस पर आघात नहीं करना चाहता
मैं उसे
एहसास दिलाना चाहता हूँ
प्रतिशोध में
तुम अपनी ऊर्जा
खत्म करके
अपने को कम कर रहे हो
कुछ नया करो
विशिष्ट करो
इन सबका क्या अर्थ
हर राह पर
कांटे बिछाओगे
तो समझ लो
एक दिन
ये कांटे तुम्हें ही लग जाएंगे ।
मुझे कमजोर खिलाडी मत समझो
दम लगाकर खेलूँगा
एक दिन जीत मेरी होगी
होगी तो होगी
अवश्य होगी ।
चुप हूँ
समय का इंतजार

एक दिन
खुलकर तुम्हारा रूप
लोगों के सामने आ जायेगा
तुम ठगे से रह जाओगे
उस दिन
मैं तुम्हें अवश्य याद आऊँगा
मैं कभी
हार मानने वाला नहीं
क्योंकि मेरे अन्दर
जीतने की प्रबल इच्छा है
इसीलिए
समय का इंतजार है
क्योंकि मैं स्टील की चट्टान हूँ
आसानी से पिघल नहीं सकता
जिसे कभी पिघलाया नहीं जा सकता ।
तो फिर
आगे आने वाले कल का इंतजार है ।
मैं एहसास करा के रहूँगा
ये मेरा वादा है।

--

हाशिये की समस्याएँ

बंद करो
नाटक-नौटंकी
मत करो छलावा
बस करो
बहुत हो गया
बूढे हो गये
खेल तुम्हारे
आंखों पर छाने लगा धुंधलका
कुछ तो नया करो
बंद करो 'रागरागिनी
'जनता' का पेट है खाली
बूढ़ी हड्डी सिसक रही है
तन पर नहीं है लता ।

'पोल' तुम्हारी खुल गयी है
झांसे में
नहीं आने वाले
कहीं 'धर्म' की राजनीति
कही प्रांतवाद है हावी
'दलीय राजनीति' का बदला मुखौटा
'राजनीति' हो गयी भारी
'मुद्दे' सारे
धरे रह गए
उनका पेट हो गया भारी
जादू नहीं
आइना है ये
जनता बन गयी
'बछिया का ताऊ' ।
सड़क खुदी की खुदी रह गयी
पत्थर आये थे
पता नहीं कहीं चले गए
'शुभ मुहुर्त' हुए / वर्षों गुजर गए
'पाच' वर्षों में
कई बार नपा 'गलियारा'
पर अब तक बना नहीं ।
कई 'पंचवर्षी योजनाएं'
बीत गयी
पर उनका कोई खाल नहीं ।
'बुधुवा का 'दुवार'
राह के चौडीकरण में मिला लिया
पर 'ठाकुर साहब' का वैसा ही बना रहा
न्याय का 'हनन' हुआ
'अन्याय' सर चढ़कर बोला
राजनीति का चेहरा देखो
'प्रांतवाद' में पड़ी हुई
हाशिये पर पडी समस्याएं
‘हाशिये’ पर बनी रह गई।

3 blogger-facebook:

  1. अच्छी रचनाएँ...
    हायेकु ठीक नहीं लगे..
    ५-७-५ का नियम नज़र नहीं आया...

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. mujhe bhi aisa hi laga ....
      ५-७-५ ka niyam honaa chahiye tha to sundarataa rahati

      हटाएं
  2. रचनाकार पहले हाइकु की जानकारी लें तब लिखें तो बेहतर होगा । इस तरह के लेखन से पाठक गुमराह हो जाते हैं । मेरा विनम्र निवेदन है कि कुमार अरविन्द जी इस वेब साइट पर एक बार जाएँ http://www.hindihaiku.net/
    आपके नियमबद्ध हाइकु का स्वागत होगा ।
    -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

    उत्तर देंहटाएं

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