शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

अनुराग तिवारी की कविता - जब तक सांसें हैं...

जब तक सांसें हैं

जब तक सांसें हैं सीने में,

जी लो।

जब तक मय है पीने में,

पी लो।

माना दुनिया में गम हैं ढेरों यारों,

धूप छाँव का खेल यहाँ चलता रहता है।

लाख घना हो अँधियारा रातों का,

सुबह का सूरज भी रोज निकलता है।

 

बाँटो मत अपने ग़म,

आँसू पी लो।

जब तक सांसें हैं सीने में,

जी लो।

जीवन के हर इक पल में खुशियाँ ढूँढ़ो,

दीन, दुखी, मज़लूमों से नाता जोड़ो।

आस बनो उनकी जो जीवन से हारे हैं,

दीप बनो उनका, जिनकी राहों में अँधियारे हैं।

 

दिखे जहाँ अन्‍याय, मुखर हो,

होंठ मत सी लो।

जब तक सांसें हैं सीने में,

जी लो।

नारायण का अंश जीव है, ध्‍यान रहे,

उसकी सेवा ही जीवन का ध्‍येय रहे।

प्राणी मात्र में प्रभु को देखो, यही भजन है।

है प्रमाद ही मृत्‍यु, जागरण जीवन है।

 

जब तक जीवन है,

राम नाम रस पी लो।

जब तक सांसें हैं सीने में,

जी लो।

--

-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

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