मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

प्रभा मुजुमदार की कविताएँ

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संवाद

कल तक यहाँ

संवादों की

खुली आवाजाही थी

मगर आज सारे रास्ते

बन्द हो गये लगते है.

प्रश्न/ प्रतिप्रश्न

अर्धविराम

और विस्मय-चिन्ह

ट्रैफिक जाम मे

छटपटा रहे है.

आहें और चीत्कार

गले मे ही दम तोड देती है.

बीते हुए सारे पल

अनुभूति/ सम्वेदनाएं

कवरेज क्षेत्र से बाहर हो गये है.

सुबह शाम

व्यस्तता के सन्देश

मिलते है.

शायद फिर

इजाद करनी पडे

सम्वादों की नई भाषा

गढने होंगे नये पते

रिश्तो की नई परिभाषा.

अनलिमिटेड

टाँक टाइम के बावजूद

बेंधक है यह सन्नाटा.

--

प्रासंगिक-1

वही राजा

वही रानी

वही दरबार

वही कहानी.

राजपुरोहितों का

मंत्रोच्चार

चारणों की स्तुति

विदूषकों की प्रस्तुती.

नही बदले

संबंधों के अर्थशास्त्र

खुश करने पर

माला माल

नाराजगी पर यातना

देश निकाला.

समय के परिक्रमा पथ में

वही केन्द्र

वही परिधि.

कुछ आकर्षण

कुछ विकर्षण

कुछ तथ्य

कुछ मिथक.

वही शोषण

वही षडयंत्र

दमकते मुकुट

राजसी शान

घोडों की टॉप .....

भूख और भय

अकाल मौत

मोहताज और लाचारी.

खनखनाती स्वर्ण मुहरें...

तिनके तिनके को

फैला आँचल

कटोरी/ हथेलियाँ.

रंगमंच वही

फिर भी बदल गया है

नैपथ्य.

ईश्वर के अवतार से

जनता के

प्रतिनिधी बनने की यात्रा में

मीडिया और प्रतिपक्ष

अभिव्यक्ति की विविध परिभाषाएं

भाषण / धरना और घेराव

मतपेटियों की

अबूझ पहेलियों को भेद कर

निर्णायक विजय के क्षण

किसी भी चक्रव्यूह को भेदने से

कमतर नही है.

हर पल

पाला बदलते यौध्धा

छल-बल साम-दाम

नियमों की हेराफेरी

आंकडों के खेल.

सूर्यास्त के बाद

विश्राम करती सेना के खेमे पर

बमवर्षा.

वरदान और श्रापों की

क्षमता से सुसज्जित

ऋषि/मुनि/गन्धर्व

अश्वमेध की तर्ज पर

अभियानों का सिलसिला

बदली है रणभूमी

कवच/ ढाल

अस्त्र-शस्त्र

सिंहासन और मुकुट की

फिर भी वही है

आन बान और शान.

 

प्रासंगिक-2

तख्त और ताज

हमेशा नही रहते

और महलों को

खंडहरों मे बदलते

देर नही लगती.

संग्रहालय के

किसी उपेक्षित कोने मे

धूल से अटें

पडे रहते है

किसी वक्त के

जगमग दमकते

रत्नालंकार

शस्त्र और परिधान.

दरबारियों की

प्रतिबद्धता

बदल जाती है

नये सूरज के स्वागत में

पुष्पवर्षा और

जयजयकार के स्वर

किसी और दिशा में.

मुठ्ठी से फिसलते

वक्त के साथ

ऐश्वर्य/ वैभव और

समृद्धी के तमाम अध्याय

आँखों से धुंधलाने लगते है.

आकाश

नये नक्षत्रों की

चमक से दिपदिपाता है.

इतिहास के पन्ने पर

दर्ज होता वह पल

एक इतिहास का अंत

नये अध्याय का स्वागत.

--

 

परछाईं

चूल्हे की आंच पर

तमाम उम्र

रसोई बनाती वह

अपने भीतर की आंच को

क्रमश: बुझते हुए

देखती है.

झाडते/बुहारते/घिसते/रगडते

फर्श, बर्तन और कपडे

अंतत: छिजा चुकी है

केवल हाथों को नही

समूची देह और मानस भी.

काँल बेल की हल्की सी

आवाज के साथ लपकती

थोडी भी आहट से चौकन्नी

महसूस नही करती वह

अपने ही भीतर उठ रहा

ज्वार और भाटा.

दरवाजे पर चिपकी

दिन ब दिन

धुन्धलाती आंखे

नही पहचान पाती

अपना धुन्धलाता जा रहा अक्स.

शायद पूरा वज़ूद ही

सिमट आया है

परछाई मे.

यूँ ही चुकते चुकते

चुक गयी है

चुपचाप.

--

(चित्र - अमृतलाल वेगड़ की कलाकृति)

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