23 फरवरी 2012

मीनाक्षी भालेराव की कविताएं

*बरबाद *

यूँ भी कोई बरबाद  होता है
घर जैसे श्मशान होता है
हसरतें सारी जल गयी
हर तरफ धुंआ सा रहता है
निशान मिट गये आबादी के
खंडहरों सा जहाँ रोता है
किश्तियाँ तो डूबती हैं
मझधारों में हरदम
हम थे के किनारे ले डूबे
अधूरे अरमान लिए बैठे हैं
निशान तुम्हारे ढूंढते हैं
बेबसी का छाया है आलम
किसे कहें दास्तान ए गम

*दरवाजे*

दिल की गलियों से गुजरे हैं बार-बार अब
बंद हमने दिल के दरवाजे कर लिए हैं
रुखसत होगें हम तेरे जहान से
हमने जमाने से वादे कर लिए हैं
यूँ तो हसरतें सभी के दिलों में रहती हैं
हमने हसरतों से किनारे कर लिए हैं
तुम आओ तो सही  नफरतों का सैलाब लिए
हमने तुम्हारे हर अहसास कबूल कर लिए हैं
हम कहें या ना कहें दिल की अपने
तुम्हारी हर आरजू हमने कबूल कर ली है

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