शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

मोतीलाल की कविता - इस दुनिया के अलग अलग चेहरे

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यह दुनिया
बिल्कुल नहीँ चलती
एक सत्य की छत के नीचे

यह दुनिया
बिल्कुल नहीँ चलती
अहिँसा के रास्तोँ पर

यह दुनिया
बिल्कुल नहीँ महकती
एक प्रेम की छाँव मेँ

यह दुनिया
बिल्कुल नहीँ रचती
एक जैसी अनेकोँ रचनाएँ

इस दुनिया मेँ
अलग-अलग चेहरे होते हैं
आदमियोँ के

सबके लिए
एक जैसा सत्य
एक जैसी अहिँसा
एक जैसा प्रेम
और एक जैसी रचना
उनके चेहरे से मेल नहीँ खाती

उनके लिए
दुनिया को चलाना
एक सही दिशा मेँ
जरूरी नहीँ होता
जरुरी होता है
अपने लिए जगह बनाना
इस भरी दुनिया मेँ
भले ही पवित्रता के आँच मेँ पका
सत्य, अहिँसा, प्रेम खंडित
होता रहे सदियोँ तक । 
 
* मोतीलाल/राउरकेला

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा पटना की कलाकृति)

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