शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : कागज फाड़ कला

इधर देश में कागज फाड़ विकास का दौर चल रहा है। लोग-बाग मंच से कागज फाड़कर उसकी चिन्‍दियां बना बना कर हवा में उछाल रहे हैं और विकास की गति हवा से बात कर रही है। एक विपक्षी नेता इस कागज फाड़ विकास की तुलना कपड़ा फाड़ने से करने लग गये, उस बेचारे को क्‍या पता कि सरकार में विकास के काम कागजों पर ही दौड़ते हैं। पूरी की पूरी पत्रावली फर्जी बनाकर विकास को गति देने की नई परम्‍परा का विकास हो रहा है। पत्रावली फर्जी, हस्‍ताक्षर फर्जी मगर काम और विकास असली।

मैंने अपने पुराने कागज निकाले और फाड़ने शुरु कर दिये ताकि मेरा भी विकास हो। चुनावों के इस कागज फाड़ युग में हजारों पेड़ रो रहे है, काश उन्‍हें काट कर कागज नहीं बनाया जाता तो शायद विकास हो जाता। हर सरकारी योजना के कागजों को फाड़ो और नई योजना बनाओ। फिर फाड़ो। फिर बनाओ।

फाड़ने की कला का विकास जब मंच पर से होता है तो स्‍वर्ग में स्‍थित आत्‍माओं को बड़ा सुख मिलता है।

मैं उधारी के बिल फाड़ देता हूं मगर बनिया मेरे से ज्‍यादा होशियार है। दूध के बिल अखबार के बिल, किराने के बिल फाड़ फाड़कर मैं विकास में अपना योगदान करता हूं मगर साहित्‍य अकादमी और सरकार मानती ही नहीं कि विकास में मेरा भी योगदान है। विकास के मजे ये कि एक अकादमी अध्‍यक्ष ने अमृत महोत्‍सव में स्‍वयं ही मंच पर साफा पहन कर सम्‍मानित होने का गौरव प्राप्‍त कर लिया। इसे कहते है मंच पर कागज फाड़ विकास। और मैं टापता रह गया।

मंच हो, कागज हो, फाड़ने की कला आती हो तो आप व्‍यवस्‍था के नाम पर विकास के नाम पर इस कला की मदद से अपनी प्रेमिका के पुराने खत फाड़कर समाज में कपड़े फाड़ने वालों को सबक सिखा सकते हैं यदि आपके पास कागज और कपड़े नहीं है तो ढोल, ढोलक, सारंगी, तबला, आदि भी बजा बजाकर फाड़ सकते हैं। फाड़ने से सब का विकास होता है।

कागज फाड़ कला में विकास की अनन्‍त सभावनाएं है और विकास के रंगीन, सुनहरे सपने सत्‍ता की कुर्सी पर पहुंचा सकते हैं। सपने कभी हकीकत नहीं बनते और इसी प्रकार विकास भी कभी हकीकत का सामना नहीं करता। विकास की परिभाषा केवल ये है कि सत्‍ता की गद्‌दी पर हम बैठें। विपक्ष बैठा तो विकास का भट्‌टा बैठ जायेगा। सत्‍ता का सुनहरा चांद और सत्‍ता की चांदनी कागज फाड़ कला से आती है तो क्‍या कहने।

मैंने एक बुद्धिजीवी से प्रश्‍न किया। विकास के इस नये सिद्धान्‍त के बारे में तुम क्‍या सोचते हो। वो सरकारी बुद्धिजीवी था, सरकारी समितियों में फर्जी टी. ए. - डी. ए. लेता रहता था, तुरन्‍त बोल पडा़ -

अर्थशास्‍त्र की विदेशी अवधारणाओं में कागज फाड़ विकास का जिक्र नहीं है, मुझे आक्‍सफोर्ड व हार्वर्ड में जाकर ये सब देखना पड़ेगा। मैं सरकार से बात करुगां। एक अन्‍य बुद्धिजीवी ने स्पष्ट कह दिया नो कमेन्‍टस।

आखिर में मैंने एक वोटर से पूछा कागज फाड़ विकास के क्‍या मायने हैं। उसने स्पष्ट कहा बच्‍चे के सर पर हाथ रख कर कसम खाकर कुछ कागज के टुकडे ले लिए हैं, कुछ समय के लिए विकास की यही परिभाषा है।

कागज फाड़ कला का विकास करें और देश के पेड़ों को रोने का सुअवसर प्रदान करें।

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-यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2

फोन - 2670596

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