मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

विजय वर्मा की ग़ज़ल - खुशनसीब है वो लोग,जिन्हें उम्र है मिली मुझे तो सुख-चैन का पहर नहीं मिला.

ग़ज़ल 

बेघरों को अबतक कोई घर नहीं मिला 

हुकूमतें बीत गयी ,असर नहीं मिला.

 

कन्यादान -योजना की तामील यूँ  हुई,

गरीब कन्यायों को कोई वर नहीं मिला.

 

मिलावट का इस कदर ज़माने में चलन है,

शुद्ध हवा-पानी क्या;शुद्ध ज़हर नहीं मिला.

 

भटकता रहा प्रीत प्रतिदान की चाह में,

कहीं कोई ठौर,कही बसर नहीं मिला.

 

तेरा शहर भी क्या हादसों का शहर है?

बे-हादसा गुजरता हो,ऐसा शहर नहीं मिला.

 

खुशनसीब है वो लोग,जिन्हें उम्र है मिली 

मुझे तो सुख-चैन का पहर नहीं मिला.

9 blogger-facebook:

  1. तेरा शहर भी क्या हादसों का शहर है?

    बे-हादसा गुजरता हो,ऐसा शहर नहीं मिला.

    बेहतरीन...

    उत्तर देंहटाएं
  2. विद्याजी,इंडियन सिटिज़न,कजाक कुमारजी और संगीताजी
    --आप सभी को प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

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