शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता : कुर्सी नहीं है दूर ........!

कुर्सी नहीं है दूर ........!

राजनीति के जंगल में थे जो बदनाम

आज वही कुर्सी के खातिर करते संग्राम

धर्म युद्ध के नाम पर स्‍वार्थ युद्ध हर ओर

घोटालो में डूब कर चर्चित बने चोर

जाति और धर्म के नये खड़े संबंध

कुर्सी के लिए किये नये अनुबंध

विपक्ष में बैठ भोगा था वनवास

इस बार दूर होगा अब संत्रास

शैतान भी बन उन्‍हें बने नासूर

मिलेगी मंजिल कुर्सी नहीं है दूर

साधु शैतान के फर्क हुए अब दूर

कुर्सी के लिए मिलने को मजबूर।

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तैयार हैं हम

सजी धजी सलीबों पर चढ़ने के लिए

आँख,हाथ, जिगर पर ठोक दो कीलें

खून का एक-एक कतरा रहने तक

तुम्‍हारे दंभी, कठोर चेहरा का आवरण उतारते रहेंगे

खेत,नदी,पर्वत निगल नहीं पाओगे

चाहे जितनी छाया रहे उदासी

पूंजी के पंजे घायल कर दे अंग-अंग

मन को घायल नहीं कर पायेंगे।

विकास के स्‍वार्थी आवेग में

पथराई संवेदना के बावजूद

कीमत नहीं लगा पायेगें

कुछ स्‍वार्थी गिद्ध और कौऐ

तुम्‍हारी स्‍तुति गा सकते या गायेंगे

वैश्‍वीकरण को समय की माँग बतायेंगे

एन.जी.ओ. के माध्‍यम से चारण जुटायेंगे

समता और ममता की बात करते-करते

आदिवासियों को स्‍वच्‍छ पानी दिलाने

का आश्‍वासन दिलाये जायेंगे

मेरी आवाज भयभीत नहीं है

सूरज के उजाले में सच ही सामने लायेंगे

जड़ों से उखड़ कर

विस्‍थापन का दर्द हम ही सुनायेंगे

जो कई बार उजड़ा है

नये घोंसले की कीमत वही जान पायेंगे

वो क्‍या जाने जो अन्‍दर से नहीं है जीवित

जिनकी जिन्‍दगी हो गई सीमित

वह लगा सकते हैं

कभी भी किसी की कीमत

चाहे जितनी करो जहमत

हम नहीं हो सकते हैं सहमत

लूट पर नहीं लगती लगाम

बन्‍द नहीं कर सकते प्रतिरोध का काम

सुबह हो या शाम

नहीं टकराते हैं जाम

प्रायोजित खबरों का नहीं खेलते खेल

सत्‍ता की नहीं पकड़ते हैं रेल

एक बड़ी उम्‍मीदों में खड़ा है जनमत

अब देख जानकर अपना देगा मत

--

-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदनः 120/132

बेलदारी लेन, लालबाग, लखनऊ

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