प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो कविताएँ - अब कहीं से भी कभी चिट्ठी नहीं आती

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करो अब गद्दियां खाली नया अब साल आया है

किसी की बात न सुनते सदा अपनी चलाते हैं
सभी के सामने मैदान में नंगे नहाते हैं।

बताते हैं जमाने को सभी को मशविरा देते देते
उन्हें पकड़ो सलीके से जो खुलकर लूट खाते हैं।

नशा पश्चिम का मेरे दोस्तों पर इस तरह हावी
कि वे खुद हो गये मुनसिफ पिता रिक्शा चलाते हैं।

तुम्हारी मुर्गियों के पेट में सोने के अंडे हैं
तुम्हारे मातहत ही आजकल सबको बताते हैं।

कड़कती ठंड में तुम तो छुपे बैठे लिहाफों में
यहां घुटने लगाकर लोग छाती को बचाते हैं।
तुम्हारी फाईलों में ठंड से सबको बचाया है
यहां पर तापने को लोग अपनॆ घर जलाते हैं।

करो अब गद्दियां खाली नया अब साल आया है
तुम्हारी पदवियों को छीनने हम शीघ्र आते हैं।

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चिट्ठी नहीं आती

अब कहीं से भी कभी चिट्ठी नहीं आती

भूल से ही हो सही चिट्ठी नहीं आती।

 

मोबाइल का ये आधुनिक पश्चिम का दौर है

हाथ पर जमता दही चिट्ठी नहीं आती।

 

डाकिये को आज फिर घर का पता दे दो

बात दादी ने कही चिट्ठी नहीं आती।

 

रोज बाबा ताकते बाहर निहारते

हो गई क्यों निर्दयी चिट्ठी नहीं आती।

 

इन बुजुर्गों को भला अब कौन समझाये

बात हुई आई गई चिट्ठी नहीं आती।

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