मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की ग़ज़लें - बाहर सर्द सुबह हूँ पर भीतर दुपहर दहता हूं...

ग़ज़ल

झूठ से डरकर रहता हूँ ,

कड़वा सच पर कहता हूँ.

 

बूढ़ी माँ की आँखोँ से ;

आँसू बनकर बहता हूँ .

 

बाहर सर्द सुबह हूँ पर ;

भीतर दुपहर दहता हूँ .

 

सुख-दुख हैँ 'महरूम' अपने ;

दोनोँ से ही निबहता हूँ .

 

= = * =

ग़ज़ल

ख़ाक हैँ जो कल आग रहे हैँ .

ज़द्दोज़हद का राग रहे हैँ .

 

राह जहाँ, मंज़िल भी वहाँ पर ;

मील के पत्थर भाग रहे हैँ .

 

होँगे जोड़-गुणा अब हम क्या

आजीवन ऋण-भाग रहे हैँ.

 

सोकर क्या नायाब खो दिया

क्या पाया जो जाग रहे हैँ ?

 

हैँ 'महरूम' दाग़दामन हम ;

पर दिर से बेदाग़ रहे हैँ .

 

= = * = =

ग़ज़ल

गूँगी-बहरी तेरी ख़ुदाई .

अंधी-पंगु हुई प्रभुताई .

 

इन्सां बने नहीँ बन बैठे ;

हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई .

 

क़द मेँ कमतर है जनमत से;

सत्ता-सियासत की ऊँचाई .

 

कामचोर, ठलुए सदनोँ मेँ ;

ओहदोँ पर काबिज़ हैँ कसाई.

 

हक़ की बात कही जो 'महरूम, ;

तो पानी मेँ आग लगाई .

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