सूरज पुरी के दो गीत - पोर-पोर, शाम-शाम, उतर गई आज शाम

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वासंती एक शाम (गीत)

पोर-पोर,शाम-शाम,उतर गई आज शाम
वासंती एक शाम,वासंती एक शाम
चढी धूप उतर गई, सीढ़ी पर ताल के
दीये कुछ थिरक उठे,लहरों की चाल पे, मंदिर के
कलशों से उतर गई आज शाम(वासंती एक शाम)
बिन्दी एक लुढक गई,पश्चिम के भाल से
तारे कुछ उभर रहे,संध्या के गाल पे, केश गुंथे
जूडे पर, जुही जुडी आज शाम,(वसंती एक शाम)
धूल उठी गलियों से, शाखों से उलझ गई, दिन भर की अकुलाहट,
पातों की सुलझ गई अमुवा के बौरों से, लिपट गई आज शाम,(वासंती एक शाम)
आंगन के तुलसी के बिरवे के नीचे,
जुडॆ हाथ,झुका माथ ,दो अंखियां मीचे, सधवा के
वंदन में,सिमट गई आज शाम,(वासंती एक शाम)

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याद के बादल.
ह्रदय आकाश पर मेरे, छितरकर छा गये बादल
तुम्हारी याद के बादल
लरज के,साथ गरजन के ,बदरिया छा गई उर पे,
कि जैसे याद के पाहुन, भटककर आ गये घर पे, कि
भूलों की सगाई, याद के करवा गये बादल,
तुम्हारी याद के बादल

घहरकर छा रही बदरी, मिलन को कर रही इंगित
तडपकर टूटती बिजुरी, धड़क कर मिल गये दो दिल
कि बिजली की तड़प से दिल जुडाते आ गये बादल
तुम्हारे याद के बादल

घटा ने थाम लो ढपली, कि बूंदें गा रहीं कजली,
"बिदेसिया पी नहीं आये"- कोयलिया दर्द से बोली
तुम्हारे दर्द से रिश्ता,........ बंधाते आ गये बादल,

तुम्हारे याद के बादल.
तुम्हारी याद , बीते पल सजाकर इस तरह बैठी,
कि जैसे कोई बिरहन रात में दियना जला बैठी,
तुम्हारी याद को बांधे,....... उतारे जा रहे बादल
तुम्हारी याद के बादल.

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सूरज पुरी,

ताप्ती कुण्ड वार्ड, मुलताई (बैतूल)


प्रस्तुति - गोवर्धन यादव.

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2 टिप्पणियाँ "सूरज पुरी के दो गीत - पोर-पोर, शाम-शाम, उतर गई आज शाम"

  1. बिन्दी एक लुढक गई,पश्चिम के भाल से
    तारे कुछ उभर रहे,संध्या के गाल पे, केश गुंथे
    जूडे पर, जुही जुडी आज शाम,(वसंती एक शाम)

    बहुत खूबसूरत गीत...

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी4:54 pm

    Basant aankho ke aage chha gaya

    उत्तर देंहटाएं

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