शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

विजय पाटनी की कविता - किसी नयी दुनिया में इस बार ले चल

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वक्त के पार ले चल , किसी नयी दुनिया में इस बार ले चल
इक अरसे से उसने देखी नहीं ख़ुशी , मुस्कराहट उसके लिए दो चार ले चल
किसी नयी दुनिया में इस बार ले चल।

कब से अकेले खड़ी  है वो थामे  उम्मीद का दामन
वक्त के थपेड़ों ने भी उसे टूटने ना दिया
उसके आस पास एक मजबूत रिश्ते की दीवार ले चल
किसी नयी दुनिया में इस बार ले चल।

एक उम्र से उसने अपने लिए कुछ नहीं माँगा
उपहार "जिन्दगी" का , लोगों की सेवा में अर्पण किया
आज तू काबिल उसकी वजह से , उसके लिए पूरा बाजार ले चल
किसी नयी दुनिया में इस बार ले चल।

मुद्दतों से उसकी हंसी नहीं सुनी किसी ने
आँखें उसकी भीगी नहीं ख़ुशी से कभी
आज उसके लिए कोई मुस्कराता हुआ विचार ले चल
किसी नयी दुनिया में इस बार ले चल।

गर तू ज़माने के बोझ तले दबा है
तेरे ऊपर है जिम्मेदारियां नई
छोड़ सारे उपहार , उसके लिए सिर्फ प्यार ले चल
किसी नयी दुनिया में इस बार ले चल।

विजय पाटनी
नसीराबाद , राजस्थान 

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