गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

आचार्य विद्यानंद की विवेचना : उत्कोच दान माना जाता था घूस को

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उत्‍कोच शब्‍द का अर्थ घूस अथवा रिश्‍वत है। यह एक प्रकार का निंदनीय उपाय माना जाता है, क्‍योंकि रिश्‍वत देने वाला व्‍यक्‍ति अपना कोई कार्य सिद्ध कराने के लिए उस कार्य के लिए अधिकृत व्‍यक्‍ति को गुप्‍त रूप से धन या वस्‍तु प्रदान करता है। या इसी तरह किसी काम की देखभाल के लिए बैठाया गया व्‍यक्‍ति अपने उस काम के एवज में किसी व्‍यक्‍ति से धन अथवा कोई पदार्थ मांगता या लेता है। इस धन या पदार्थ को प्राचीन काल में उत्‍कोच कहा जाता था। उत्‍कोच लेने या देने वाला अपने धर्म या कर्तव्‍य के हिसाब से काम नहीं करता, बल्‍कि उस धन के लिए करता है। इसीलिए इसे निंदनीय माना गया है।

यह एक तरह का दान है, जो निकृष्‍ट है। भगवान महावीर के नाना, राजा चेटक से राजा श्रेणिक का पुत्र अभय कुमार एक व्‍यापारी का रूप बना कर मिलने गया, किन्‍तु कोतवाल ने उसे महल के अंदर प्रवेश नहीं करने दिया। तब अभय कुमार ने कोतवाल और वहां तैनात सिपाहियों को उत्‍कोच दान अर्थात घूस देकर भवन में प्रवेश किया। उसने राजा के नजदीक रहने वाले लोगों- कोतवाल, दीवान आदि को घूस देकर उन्‍हें अपने वश में कर लिया था। आदिपुराण में भी उत्‍कोच (घूस) लेने का उल्‍लेख मिलता है। कथा के अनुसार राजा ने अपने राज्‍य के चांडाल को विद्युच्‍चोर को मारने का निर्देश दिया। लेकिन चांडाल ने राजा की आज्ञा नहीं मानी। तब राजा ने कहा, इसने कुछ घूस खा ली है, इसलिए उसने क्रोधित होकर चोर और चांडाल दोनों को निर्दयतापूर्वक सांकल से बंधवा दिया।

आज से चार सौ साल पहले देश की प्रथम आत्‍मकथा पं. बनारसी दास द्वारा लिखित अ(कथानक है, जिसका अनुवाद विश्‍व की अनेकों भाषाओं में हुआ है। इसमें उन्‍होंने मथुरा से आगरा की अपनी एक यात्रा का जिक्र किया है। इसमें उस समय की घूस लेने और देने की एक घटना का उल्‍लेख है कि किस प्रकार उन्‍होंने कोतवाल, दीवान आदि को यथायोग्‍य धन देकर अपने वश में किया था।

चाणक्‍य ने अपनी किताब अर्थशास्‍त्र में लिखा है कि जिस प्रकार सरोवर के जल की सुरक्षा के लिए रखे गए चौकीदार, प्‍यास लगने पर जल पीने के लिए अपने घर नहीं जायेंगे और उसी सरोवर से जल पीकर अपनी प्‍यास शांत करेंगे, उसी प्रकार सरकारी कर्मचारी भी अपना राजकीय कार्य करते समय थोड़ी-बहुत घूस तो खाएगा ही खाएगा, उसे कोई भी रोक नहीं सकता। ऊपर दिए गए उदाहरणों से कुछ बातें स्‍पष्‍ट होती हैं। पहली बात यह कि घूस लेने-देने का रिवाज नए जमाने की देन नहीं है, जैसा कि अनेक लोग कहते हैं। यह मानव सभ्‍यता के बहुत आरंभिक काल से चला आ रहा है।

दूसरे यह क यह संसार लोभ, मायाचार और रिश्‍वत बिना नहीं चल सकता। हां, इस प्रथा को कम जरूर कया जा सकता है। जैसे याज्ञवल्‍क्‍य के समय उत्‍कोच देने-लेने वालों के लिए कठोर दंड प्रक्रिया थी। उस समय यह मान्‍यता थी कि रिश्‍वत ग्रहण करने वाले व्‍यक्‍ति को तुरंत उसका सारा धन छीनकर उसे राज्‍य से निर्वासित कर देना चाहिए। मेरा ऐसा मानना है कि आज भी ऐसे कठोर नियमों की आवश्‍यकता है। जो नियम बनें, उन्‍हें कठोरता से लागू किया जाए और उसकी गंभीरता से निगरानी की जाए। पर किसी भी समाज को उत्‍कोच से मुक्‍त करने के लिए सबसे जरूरी यह है कि दूसरों को सुधारने से पहले हम स्वयं ईमानदार बनें।

यदि हम समझते हैं कि कठोर कानून बनाने और उसका उल्‍लंघन करने वालों को कठोर दंड देने भर से कोई समाज उत्‍कोच से मुक्‍त हो जाएगा, तो यह भ्रम है। यदि समाज के सदस्‍य वभाव से बेईमान हैं, तो वे घूस लेने का कोई न कोई रास्‍ता बना ही लेंगे।

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(समृद्ध सुखी परिवार http://www.sukhiparivar.com/  मार्च 2012 से साभार)

3 blogger-facebook:

  1. बहुत ही सुन्दर भाव| धन्यवाद।

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  2. जो नियम बनें, उन्‍हें कठोरता से लागू किया जाए और उसकी गंभीरता से निगरानी की जाए। पर किसी भी समाज को उत्‍कोच से मुक्‍त करने के लिए सबसे जरूरी यह है कि दूसरों को सुधारने से पहले हम स्वयं ईमानदार बनें।

    ---yahee saty hai....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी10:30 am

    सर्व प्रथम आचार्य जी को धन्यवाद, एक प्राचीन शब्द से अवगत कराया।
    उत्कोच के संबंध में उनकी संकल्पना मार्गदर्शी है । उत्कोच मानसिक प्रदूषण का एक प्रकार है। इसके अपमार्जन के लिए नैतिक शिक्षा और सत्संग के अतिरिक्त अब तक कोई यन्त्र नहीं बना है।
    धन्यवाद,
    डॉ. ओमकार नाथ शुक्ल

    उत्तर देंहटाएं

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