गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

लघु पत्रिका "शबरी शिक्षा समाचार" की समीक्षा

समीक्षक - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

शबरी शब्द भारतीय लोकमानस के अंतर में बसा है। जिस भीलनी ने भगवान राम को जूठे बेर महज इसलिये खिलाये थे कि कहीं भूल से कोई खट्टा बेर उन्हें न मिल जाये और मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने कैसे बड़े प्रेम से वे जूठे बेर खाये थे रामायण पढ़ने वाला हर भारतीय इस तथ्य को जानता है। उसी शबरी के नाम पर‌ यह पत्रिका दक्षिण भारत के सेलम तामिलनाडु से हर माह प्रकाशित हो रही है। दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार प्र‌सार का यह‌ एक स्तुत्य प्रयास है इसके लिये संपादक समूह निश्चित ही सम्मान के पात्र हैं।

उत्तर दक्षिण को भाषाई आधार पर जोड़ने में यह लघु पत्रिका सेतु का काम कर‌ रही है। हिंदी प्रसार के अश्वमेघ के घोड़े को तामिलनाडु में ही रोका गया था शायद इस आभास से कि उन पर हिंदी जबरन थोपी जा रही है। तब हिंदी के मूर्धन्यों ने इस बात का समर्थन किया था कि जब हम दक्षिण में हिंदी भेजना चाहते हैं तो हमें भी तो दक्षिण की भाषायें सीखने की पहल करना चाहिये।

इस मायने में यह छोटी सी पत्रिका जादू का काम करेगी। चौद‌ह‌ व‌र्षों से प्र‌काशित‌ इस‌ प‌त्रिका का फ‌र‌व‌री 2012 अंक‌ मेरे साम‌ने है। साहित्य‌क‌ र‌च‌नाओं और‌ संप‌र्क‌ के माध्य‌म‌ से इस‌ ल‌घु प‌त्रिका ने सारे देश‌ को जोड़‌ने का प्र‌यास‌ किया है। इस‌में आसाम‌ की शुभ‌दा पांण्डेय‌ की र‌च‌नायें शामिल‌ हैं तो चेन्नै के श‌शीलेन्द्र‌ कुमार‌ गुप्त‌ भी स‌म्मिलित‌ हैं। अह‌म‌दाबाद‌ के प्रो.भ‌ग‌वान‌दास‌ जैन‌ की र‌च‌ना स‌म्मिलित‌ है तो दिल्ली के राधाकांत‌ भी लिये ग‌ये हैं। चंडीग‌ड़‌ के म‌नोज‌ सिंह‌ का लेख" क्या क‌भी स‌त‌युग‌ था "के वाच‌न का आनंद‌ मिल‌ र‌हा है तो फ‌रीदाबाद‌ के डा.वेद‌ व्य‌थित‌ की लोक‌पाल‌ प‌र‌ लिखी व्यंग्य‌ क‌विता अप‌नी अल‌ग‌ छाप‌ छोड़‌ती दिख‌ रही है। छिंद‌वाड़ा से मेरी दो बाल‌ क‌विताओं को भी स‌स‌म्मान‌ प्र‌काशित‌ किया ग‌या है। "मामा के घ‌र‌" और‌ "प‌ह‌ले सीखो रुप‌ये क‌माना" ब‌च्चों को आनंदित‌ क‌र‌ती हुईं क‌वितायें हैं। राम‌निवास‌ मान‌व‌ की "अंधेरी राह और मैं" भी आंदोलित‌ क‌र‌ती है।

प‌त्रिका के स‌हाय‌क‌ संपाद‌क‌ आर‌.जे. संतोष‌ कुमार‌ ने भी अप‌नी र‌च‌नाओं से प‌त्रिका को संभाला है। स्कूल‌ के ब‌च्चों की क‌विताओं को शुमार‌ क‌र‌ ब‌च्चों के प्रोत्साह‌न‌ का ध्यान‌ भी र‌खा ग‌या है। एक प्र‌शंस‌नीय‌ कार्य‌ य‌ह‌ भी है की एक‌ क‌था संस्क्ऋत‌ की भी शामिल‌ की ग‌ई है। अंत‌ के कुछ‌ प‌न्नों में तामिल‌ भाषा की र‌च‌नाओं को स्थान‌ दिया है। दोनों भाषाओं हिन्दी और‌ तामिल‌ लिपि की र‌च‌नायें एक‌ ही प‌त्रिका में प‌र‌काशित‌ क‌र‌ एक‌ संतुल‌न‌ का प्र‌यास‌ य‌थार्थ‌ में स‌राह‌नीय‌ है। हां तामिल‌ भाषा के लेखों का हिंदी में अनुवाद‌ हो जाये तो हिंदी भाषियों को भी स‌म‌झ‌ में आ जाये।

किताबों की समीक्षा और साक्षात्कार स्तंभ शामिल कर पत्रिका को संपूर्ण पत्रिका का दर्जा देने का प्रयास है। प‌त्रिका के प्र‌धान‌ संपाद‌क‌ एम‌. वेंक‌टेश्व‌र‌न‌ संयुक्त‌ संपाद‌क‌ आर‌. जय‌क‌र‌न‌ और‌ स‌हाय‌क‌ संपाद‌क‌ आर‌. जे. संतोष‌कुमार‌ ब‌धाई के पात्र‌ हैं। य‌दि तामिल‌ की पाठ‌शाला जैसे शीर्ष‌क‌ से तामिल भाषा की प्रारंभिक‌ शिक्षा मिल‌ने ल‌गे तो हिंदीभाषी इस‌ प‌त्रिका के आभारी होंगे।

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