गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' के नवगीत व ग़ज़ल

आकाश फटा है/
बबुए छेदोँ पर मत थिगड़ियाँ लगा,
सारा का सारा आकाश फटा है.

तलवारेँ काग़ज़ी बेमतलब भाँज नहीँ
मत दौड़ा स्याही के घोड़े नीले-लाल ;

ज़ेहन की उर्वरा भूमि हुई बाँझ नही
बदल रही हैँ तेवर गैँतियाँ-कुदाल ;

नौसिखुए नाविक ! है सदी-नदी विध्वंसक
पुश्तैनी घाट तेरा बहुत कटा -छँटा है.

रोटी,छत-छप्पर की अंतहीन यात्राएँ
पैरोँ की अनबदली नियति बन गईँ ;

आयातित सपनोँ कीभरमीली छलनाएँ
कुनबे की प्रामाणिक प्रगति बन गईँ.

साँप जो सँपेरे थे छोड़ गए वही आज
जन-अगुआ बनकर सिँहासन पर डटा है.

-


जहाँ न अपना आबो- दाना.
वहाँ न अपना ठौर-ठिकाना.

सुख से दूर की रिश्तेदारी ;
दुख से है गहरा याराना.

मर गया जिनकी आँख का पानी ;
उनके लिए मत अश्क बहाना.

आखिरी ख़त मेँ उसने लिखा था ;
याद न करना,याद न आना.

गूँगे-बहरोँ की महफ़िल मेँ ;
किससे सुनना,किसे सुनाना.

माज़ी की गलियोँ मेँ अक्सर;
छुप-छुपकर होता है जाना.

जो तुमने 'महरूम' दिए वो ;
ज़ख़्मे-दिल क्या तुम्हेँ दिखाना.

--.
ग़ज़ल/
नादां नहीँ जो कलम को औज़ार कहे है .
औज़ार भी ऐसा कि पुरअसरार कहे है .

कल देखना वो देगा मिला खाक़ मेँ तुझको ;
जो आज तेरा ख़ुद को खाक़सार कहे है .

वो दौर-ए-गर्दिश मेँ तेरे साथ न होँगे ;
तू आज जिन्हेँ अपना तरफदार कहे है .

ज़ोशो-ज़ुनूं-ए-ख़ून है , ज़ज़्बा है,भरम है ;
है भूख ज़िस्म की तू प्यार कहे है .

'महरूम' ज़िंदगी ने दिए हैँ उसे ग़म ही ;
फिर वो ज़िन्दगी को ख़ुशगवार कहे है .

--.

देवेन्द्र कुमार पाठक (तख़ल्लुस 'महरूम')
जन्म -02.03.1955;ग्राम-भुड़सा, ( बड़वारा )जिला-कटनी, म. प्र.में;
शिक्षा-M.A.B.T.C.( हिंदी/अध्यापन)प्रकाशित पुस्तकेँ-'विधर्मी', 'अदना सा आदमी' (उपन्यास) 'मुहिम', 'मरी खाल:आखिरी ताल','चनसुरिया का सुख','धरम धरे को दण्ड' (कहानी संग्रह )'दिल का मामला है'( व्यंग्य संग्रह ) 'दुनिया नहीँ अँधेरी होगी' (गीत-नवगीत)
व्यवसाय-अध्यापन;
संपर्क- प्रेमनगर,खिरहनी.साइन्स कालेज डाकघर,कटनी 483501 म.प्र. ई मेल- devendra.mahroom@gmail.com

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