गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

आर वी सिंह की कविता - क्या पाती हैं महिलाएं?

क्या पाती हैं महिलाएं?

पैदा होते ही पाती हैं हिकारत,

घृणा और उपेक्षा अपने लिए-

सबकी आँखों में।

यहाँ तक कि खुद की जननी और जनक की आँखों में भी।

 

उनके हिस्से आता है भय और त्रास।

कोई बधाइयाँ नहीं देता,

बँटती नहीं मिठाइयाँ, नहीं पीटता थाल कोई भी।

नेग नहीं हैं माँगे जाते।

कोई नहीं लेता उन्हें हाथों-हाथ

नन्हीं-सी जानें बन जाती हैं बोझ पूरे खानदान पर

उनका मुक्त हास, खेलना-कूदना, बोलना-बतियाना सब कुछ

सच-सच कहें तो उनका अस्तित्व मात्र

गुजरता है नागवार, सबको।

 

भइया का मनता है जन्म-दिन

जाता है अच्छे स्कूल

पाता है अच्छे खिलौने, कपड़े, साइकिल।

खाती है मार भाई की और उन्हीं हाथों पर बाँधती है राखियाँ

साल-दर-साल।

होते-होते किशोरी ब्याह बन जाता है मुद्दा

भरता हुआ शरीर चिन्ताएं भरता है दिमाग में सबके

समाज के भेड़िए रचने लगते हैं जाल

आफत की पुड़िया दिखने लग जाती है बिटिया

हर दिन दुश्चिन्ता में बीतने लगता है बाप का

किसी तरह निपटाएं इसे

उतारें अपना बोझ

करें कन्यादान और पाएं मुक्ति- सोचते हैं अभिभावक।

 

जैसे-तैसे जुटता है दहेज

ढूंढा जाता है वर- होती है सौदेबाजी

कर डाला जाता है ब्याह

येन-केन-प्रकारेण।

बिटिया जो जन्म से ही थी पराई

पाल-पोसकर, दान-दहेज सहित

सौंप दी जाती है वधिकों के हाथ।

 

अब जाने बिटिया, या जाने उसका नसीब

या वो भगवान- जो खुद पुरुष है अकर्मण्य (माया के बिना)।

हम तो नहाए गंगा।

बिटिया बन जाती है बहुरिया

पति, सास-ससुर, ननद-देवर, जेठ-जिठानी

सब की दासी

पकाती है भोजन, धोती है कपड़े, माँजती है बर्तन, करती है सफाई, बजाती है हुकुम

सुबह से शाम तक।

सजाती है सेज रात को या जब चाहे पति-परमेश्वर।

 

जनती है बच्चे

धोती है पोतड़े, पोंछती है रेंट, बदलती है लंगोट,

पकाती है टिफिन, भेजती है स्कूल, कराती है होमवर्क

रोज ब रोज।

और सजाती है सेज रात को या जब चाहे पति-ताकि उसका घर बसा रहे।

खाती है मार। लाती है दहेज। माँगें करती है पूरी।

और यदि न करे तो...?

तो जलाई जाती है पेट्रोल से।

गृहस्थी की धुरी बनी-

घिसती-पिसती-जलती रहती है रात-दिन।

 

अपना ही स्नेह लिए-लिए।

डोलती है घर-भर

सबका खयाल करती हुई।

सबको जिलाकर खुद तिल-तिल मरती हुई।

वह बीमार हो, या ठीक हो,

उसे जर हो-बुखार हो, दर्द हो, पीड़ा हो..तो क्या

है तो.. हुआ करे।

गृहस्थी का काम तो सब उसे ही करना है।

 

पति को ठसका है- कमाता है।

बच्चों को समय कहाँ- पढ़ते है।

न पढ़ रहे हों तो क्रिकेट खेलकर, टीवी पर कार्टून देखकर

कंप्यूटर पर कोई साइट खोले माँ पर अहसान जताते हैं।

बच्चे बड़े होकर घोंसला छोड़ देते हैं

पति हो जाता है यायावर

पीछे रह जाती है माँ-

अपनी खाँसी, अपनी टीबी, अपने कैंसर

अपनी बंध्या उम्मीदों के सहारे।

 

अपने घर में

अथवा

किसी वृद्धाश्रम में

अथवा

काशी मथुरा के किसी मंदिर की सीढ़ी पर

जिसके भीतर रहता है भगवान- पुरुष है जो

अकर्मण्य स्वयं – अपनी माया के बिना।

चली जाती हैं एक दिन निष्ठुर दुनिया से-

न उनका नाम बचता है न गोत्र न कुल

सब कुछ पुरुष को देकर…

मैं पूछता हूँ सबसे

क्या पाती हैं महिलाएं?

--

आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001

ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

9 blogger-facebook:

  1. पढ़ते-२ पाया, मेरी आँखें नम हैं. आपकी कविता मन को छूकर अन्दर तक झिंझोड़ गई. लगता नहीं था कभी कोई पुरुष इतने गहरे तक स्त्री के मनोभावों को समझेगा. काबिले तारीफ हैं आप और आपकी सोच. आगे भी ऐसे ही लिखते रहिये. शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया!

    उत्तर देंहटाएं
  2. दीप्ति मित्तल7:55 pm

    बहुत संवेदनशील कविता है। समाज मे स्त्रियों की औसतन यही स्थिती है।
    जब भी ऐसा कुछ पढती हूँ तो ईश्वर के लिए लाख लाख धन्यवाद निकलते हैं कि
    उसने मुझे पिता और पति दोनो के ही घर प्यार, हक, इज्जत और आजादी बख्शी।
    आर.वी.सिंह जी, आपकी प्रोत्साहन भरी ईमेल के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. कविता में उल्लिखित सभी बातें सत्य हैं. दयनीय स्थिति है महिलओं की. यद्यपि मेरे यहाँ बिटिया का जन्मदिन तो हर साल मना पाते हैं लेकिन बेटे को शिकायत है कि उसका नहीं मनाते. इस वर्ष से दोनों का मनाना प्रारंभ करूंगा. सभी महिलाओं की स्थिति सुधरे, यही दुआ करूँगा...

    उत्तर देंहटाएं
  4. har yug main aurat tere yahin kahine aanchal main dhud, akhon main hain pane..

    उत्तर देंहटाएं
  5. har yug main aurat tere yahin kahine aanchal main dhud, akhon main hain pane..

    उत्तर देंहटाएं
  6. har yug main aaurat teri yahin kahani anchal main hain duud ankhain main hain pani...

    उत्तर देंहटाएं
  7. shabd nahi ki kya kahu.....bahut sunder..

    उत्तर देंहटाएं

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