मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

मिलन कुमार की कविताएँ - दुआ दो कि ऐसा एकतारा बनूं मैं

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सोचा था तेरा सहारा बनूं मैं.
और तेरी आंखों का तारा बनूं  मैं.

मगर मेरी क़िस्मत मे ए भी नहीं था कि ,
कश्ती का तेरी किनारा बनूं मैं .

अगर कर सको तो इनायत करो कि,
महफ़िल का तेरी दुलारा बनूं मैं .

झूमे सारी महफ़िल मौशिकी पे जिसकी,
दुआ दो कि ऐसा एकतारा बनूं  मैं .

अगर दे सको तो क़सम  दो मुझे कि,
सिर्फ़ तेरी मुहब्बत का मारा बनूं मैं .

तेरे सिवा ख्वाब देखूं किसी का तो,
दुनिया में सबसे बेचारा बनूं मैं .
--

कब तक इन जम्हूरियत के दलालों के आगे रोओगे.
देश भक्तों जागो अरे कब तक  तुम सोओगे.

अब भी न जगे तो कल इतिहास तुम्हें कोसेगा .
हर जुल्म वो सितम को जमाना  कैसे कोई सह सकता.
खा के जमीर पर चोट भी चुप कैसे कोई रह सकता.

साँप की लकीर पीटने की आदत को अब बदल डालो,
खुद भी बदलो और जमाने को बदल डालो, तू
फ़ानों क रुख मोड़ो और दरिया का रुख बदल डालो .

आख़िर कब तक  कोई बेहिस,बेखयाल कोई रह सकता. 
खा के जमीर पर चोट भी चुप कैसे कोई रह सकता. 

कब तक जाति पाति, भेद भाव की दीवारों से सर फ़ोड़ोगे,
आख़िर कब तक फ़ुरक़त, जलालत और गुरबत से नाता तोड़ोगे.

जान पर बन आये तो चूहा भी गड़ा देता है दाँत ,
फ़िर बुज़दिलों की ललकार कैसे शेर कोई सह सकता . 
खा के जमीर पर चोट भी चुप कैसे कोई रह सकता.

--

(चित्र - अमृतलाल वेगड़ की कलाकृति)

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