शशांक मिश्र भारती के चुनावी क्षणिकाएं व मुक्तक

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चुनावी क्षणिकाएं

 

1-

वे-

प्रतिपल आगे हैं,

आया मौसम देख;

कुर्सी हित भागे हैं।

2-

उन्‍होंने-

अपने विरोधियों से सीखा

आश्‍वासन देना,

अंगूठे के स्‍थान पर

उंगली दिखाना ।

3-

वे-

चुनाव में हाथ जोड़कर जाते हैं,

लेकिन-

जीतने के बाद

पानी में चंदा सा नजर आते हैं।

4-

वे-

अत्‍यधिक आगे है।

शायद चुनाव निकट हैं,

इसीलिए उतरकर कुर्सी से

सत्‍ता हित भागे हैं।

5-

वे-

अपना धन दुगुना करते हैं,

अपनी ही धुन में,

सत्‍ता पाकर अत्‍यन्‍त सरल

किश्‍तों में।

6-

वे-

आधुनिक गांधी वादी स्‍वदेशी,

शायद इसीलिए-

वस्‍त्रों को त्‍याग सभी कुछ विदेशी।

7-

उन्‍होंने-

क्‍या नहीं अपनाया

तामसी जीवन में,

सत्‍य, अहिंसा और प्रेम को छोड़कर

अपनी ऐय्‍याशी के लिए।

8-

वे-

जोंक तंत्री शासक हैं

रक्‍त शुद्धि दाता

अशुद्धियों के नाशक हैं ।

9-

वे-

खड़े नहीं होते,

शायद डर हैं-

उन्‍हें दूसरे के बैठने के जाने का।

10-

वे-

राजसुख पाने को विकल भाग रहे,

त्‍याग दिया सब कुछ

अपना भाग्‍य नाप रहे।

11-

वे-

आज बदल गए

आगे इतना बढ़े,

टूटी चप्‍पल से

हवाई जहाज में पहुंच गए।

---

ध्‍

चुनावी मुक्‍तक

1ः-

आश्‍वासनों वाले यहां मिलते बहुत हैं,

यथार्थ जो चले उनकी संख्‍या कम है।

कथनी करनी से पाना भी कछु नहीं

देश जाये गड्ढे में उन्‍हें क्‍या गम है॥

2ः-

समय रहते जो न कुछ कर पाओगे,

तम छंट जाने पर फिर पछताओगे।

अनाथों सा जीवन जीना भी क्‍या?

अभी न संभले रसातल में जाओगे॥

3ः-

बसी हुई है मन में यदि लोभ की तस्‍वीर,

एक दिवस पाओगे कच्‍चे घट सम तकदीर।

चन्‍द पलों की जिन्‍दगानी कैसा चहकना-

पीछे रह जाओगे निकल जाएगी आगे भीर॥

4ः-

अन्‍धकार में ढूंढ़ रहे वादों के मंत्र,

फूंके जो थे पहले इरादों के तंत्र।

फूल चुके कब वादों के शूल उपजे जहां-

सद्‌भाव हुआ विलुप्‍त शेष भूख पीड़ा यहां॥

5ः-

असत्‍य के समर्थन से सत्‍य दरकिनार है,

उपेक्षा से व्‍यथित होकर रो रहा करतार है।

घृणा,ईर्ष्‍या-द्वेष का बढ़ा है मोह जाल जो-

ऐसे झूठ की फैली समाज में भरमार है॥

6ः-

सत्‍पथ दर्शक कोई न असत्‌ की भरमार है,

खो गया भ्रम से सूरज कहीं, तिमिर अपार है।

भूल गए करने वाले अपने वादे इरादे सभी

अब तो चारों दिशाओं में व्‍याप्‍त धुएं की भरमार है॥

7ः-

अब कश्ती को डुबोने वाला उसका खेवन हार है,

वृद्धों ने पायी तरुणाई बढ़ा जो भौतिक वाद है।

अपनी ओर खीचने के लिए सभी में होती तकरार

अपना ही मानकर सभी कुछ पाने की भरमार है॥

8ः-

आज भी गोरों की कालों पर भरमार है,

उन्‍हीं की नीतियों पर चल रही सरकार है।

नीतियां हैं वही केवल पहनावा है बदला-

चुनता है जो जन रहता वही दरकिनार है॥

9ः-

क्‍या तरणी पर बैठा कोई सच्‍चा खेवन हार है,

नहीं सिर्फ लोभी जोंको सी तृणों की भरमार है।

पद के लालच में फंसे छिड़ती तकरारें देखो-

राष्‍ट्र व्‍याकुल वे सब कुछ पाने को बेकरार हैं॥

10ः-

सच्‍चाई बतलाना भी कभी अपराध हो जाता है,

झूठ का परदा जब भयंकर आवरण में सोता है।

चारों ओर फैला हो स्‍वार्थ का ताण्‍डव जब

सत्‍यता के लिए समय फिर कौन खोता है॥

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सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0

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