शशांक मिश्र भारती की हास्य व्यंग्य कविताएँ

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नेताजी

नेता जी आये

और अपने साथ ही

झूठे इरादों व कोरे आश्‍वासनों

की गठरी भी लाये,

मुरझाईं कलियां

दूषित हुईं गलियां

वे-

स्‍वार्थ के दल-दल में

धंसते चले गये

अनीति के सहारे ही

चलते चले गये

चलते चले गये।

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तिरस्‍कृत जन

आज का जन

कितना तिरस्‍कृत है

और-

कितना परिष्‍कृत

यह सभी कुछ जानता है,

पर-

तन्‍त्र तो अपने वायदों और

कागजों की

योजनाओं को ही

मानता है

और-

अपने उद्‌देश्‍य की प्राप्‍ति के लिए

सभी पथ पहचानता है।

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नेताजी और वोट

समय गया पीछा छोड़ दिया

दिये थे वादे नाता तोड़ लिया,

ऐसी क्‍या जल्‍दी पड़ी भई

वोटों के लिए ही मैंने

आश्‍वासनों का साथ लिया

कुर्सी पर चिपकने के लिए

जब था मन बना लिया

कई हथकण्‍डे अपनाये

तब कुर्सी को पा सका,

कई छल-प्रपंच चलाकर

उन्‍हें कुर्सी से गिरा सका,

शन्‍ति के लिए आकर

अशान्‍ति को फैलाया

रोटी-कपड़ा देने को था

महंगाई को बुलाया

सुरक्षा-व्‍यवस्‍था हित

आंतक-अलगाव लाया

गण की पीठ पर रखा तंत्र

है मुझको काफी भाया।

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सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0

ईमेल-shashank.misra73@rediffmail.com

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1 टिप्पणी "शशांक मिश्र भारती की हास्य व्यंग्य कविताएँ"

  1. वाह मिश्रा जी,सभी बहुत ही सुन्दर चुटीली रचनाएं हैं, सामयिक विषय उठाने के लिए आपको धन्यवाद....

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