मिलन चौरसिया के चंद शेर - आसमां तोड़ने नाहक उठाया पत्थर तेरी एक मुस्कान ही बहुत थी...

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मज़बूत कदम से मंज़िल ए ज़ानिब को बढो ,
फ़िर न कहना रास्ते में पत्थर थे.      

इश्क़ मुश्क़ छुपते नहीं सबसे,
छुपाने वाले पूरा चाँद  छुपा  लेते हैं .

रिश्ते निभाना भी आता नहीं 
सबको निभाने वाले पूरी कायनात निभा लेते हैं .     

आसमां  में सूराख करने को पत्थर क्यों ले लिए ,
एक मुस्कान तेरी काफ़ी थी आसमानों के लिए.   

कोरे कागज़ पर लकीरें कोई भी बना सकता है,
उन लकीरों से बने इतिहास तो कोई बात बने. 

कबतक कोई बेहिस कोई बेख्याल रह सकता.
बेखुदी, फ़ुरकत, और जलालत की मार सह सकता .

जान पर बन आए तो चूहा भी गड़ा देता है दाँत,
फ़िर ए बुजदिलों कि ललकार कैसे शेर कोई सह सकता . 

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1 टिप्पणी "मिलन चौरसिया के चंद शेर - आसमां तोड़ने नाहक उठाया पत्थर तेरी एक मुस्कान ही बहुत थी..."

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