शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - गर्ल फिरेंड

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गर्ल फिरेंड

‘बेटा ! किसका फोन था’। रंगलाल ने बेटे से पूछा। उत्तर मिला फिरेंड का। रंगलाल ने फिर पूछा ‘ फिरेंड का या गर्ल फिरेंड का’।

बेटा ताव में आ गया। बोला ‘चाहे किसी फिरेंड के पास जाऊँ, चाहे किसी फिरेंड का फोन आये। आप हमेशा एक ही बात क्यों पूछते हैं कि फिरेंड अथवा गर्ल फिरेंड। आखिर फिरेंड तो फिरेंड ही होता है’।

रंगलाल जी बोले ‘नाती सिखाए आजा को सोलह दूना बत्तीस। मैं तुम्हें कॉलेज में पढ़ाता हूँ और तुम मुझे घर में पढ़ाते हो। हमारी आँख में धूल झोखने का प्रयास मत करो। तुम जैसे लड़के फिरेंड और आधुनिकता के नाम पर अपने परिजनों के आँख में धूल झोंकते रहते हैं।

बॉय फिरेंड केवल फिरेंड ही नहीं होता। वह और भी कुछ होता है। और यदि नहीं होता तो हो जाता है। चाहे थोड़े ही समय के लिए ही।

इसी तरह गर्ल फिरेंड भी केवल गर्ल फिरेंड नहीं होती। मुझे मत पढ़ाओ। वह कुछ और भी होती है। और यदि नहीं होती तो धीरे-धीरे हो जाती है।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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