हिमकर श्याम की कविता - संघर्षधर्मिता

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संघर्षधर्मिता
                                     हिमकर श्याम

झुलसती धूप का
सामना कर पियराने
लगती है हरी घास
पग-पग पर मिलती
ठोकरों और
अनंत मुसीबतों से
जर्द हो जाती है
हमारी जिजीविषा
बचने की कोई सूरत
नजर नहीं आती है
फिर भी जूझते हैं
हम अपने पूरे
सामर्थ्य के साथ

बची रहती है
धमनियों में 
कहीं न कहीं
धुंधली संभावना
शेष रहती है कहीं
वो हरीतिमा

मुश्किलों से उबर
फिर हरापन पाना
गवाह है उस
संघर्षधर्मिता की
जो देती है हमारी
जिजीविषा को नया बल

वैसे भी-
निष्ठुर पतझड़ के बाद
आता है वसंत
झुलसती गर्मी के बाद
बरसता है मेघ
ठूंठ शाखों पर ही
फूटती है नयी कोंपले

मुश्किलों से मिलती है
जीवन की सोंधी महक
शून्य में ही अक्सर
चमकती है
उम्मीदों की किरण।

हिमकर श्याम
द्वारा: एन. पी. श्रीवास्तव
5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची: 8, झारखंड।

परिचय  वाणिज्य एवं : पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज (कीमोथेरेपी) के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

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3 टिप्पणियाँ "हिमकर श्याम की कविता - संघर्षधर्मिता"

  1. मुश्किलों से मिलती है
    जीवन की सोंधी महक
    शून्य में ही अक्सर
    चमकती है
    उम्मीदों की किरण।

    बहुत उम्दा भैया. ऐसे ही लिखते रहो.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी10:51 am

    Bahut achha likha hai aapne,yuhi likhte rahiye--Shantanu. Dubai

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी12:54 pm

    उम्मीदों की किरण हीं जगाती है आश
    शून्य से हीं अक्सर शुरू होती है,'जिदंगी का सार'

    स्वर्ण लता सिन्हा
    Bariatu, Ranchi

    उत्तर देंहटाएं

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