सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

शंकर लाल कुमावत की व्यंग्य कविता - ये चुनाव जुल्मी

ये चुनाव जुल्मी

ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है

नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है

जीतने के नाम पर इतने नाटक करवाता है

की पूरा माहौल फिल्मिया नजर आता है

जनता को रिझाकर वोट पाने के लिए

राजनेता ऐसा संजीदा अभिनय दिखाता है

जिसके सामने हॉलीवुड का सिनेमा भी

फीका नजर आता है

 

कोई एंग्री यंग मैन बनकर

हीरो की तरह स्टेज से कागज फाड़ जाता है

जिस किसी को टिकट नहीं मिलपाता है

वो पाला बदलकर विलेन का रोल निभाता है

कोई कोमेडियन की तरह

चुटकियाँ लेकर पब्लिक का मनोरंजन कराता है

कोई पुराने फ़िल्मी ठाकुर की तरह

रोटी कपड़ा और मकान का लालच दिखाकर

वोट पर अंगूठे लगवा लेना चाहता है

कोई महलों को छोड़ कर

धूल भरी सड़कों पर चक्कर लगता है

कोई बीबी बच्चों के नाम पर

वोट के लिए झोली फैलाता है

 

कोई कोई तो खुद के साथ – साथ

अभिनेताओं से भी अभिनय करवाता है

मगर फिर भी बात नहीं बनती है

क्योंकि अभिनेता जनता के सामने

रोल ठीक से अदा नहीं कर पाता है

क्योंकि बिना रीटेक के सीन करने का

वो आदि नहीं होता है

ये सब देखकर लगता है

ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है

नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है

और बेबस नेता इसके सामने नाटक दिखता है

क्योंकि कोई भी नेता

इस जुल्मी को जेल में बंद नहीं कर पाता है

और ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है

नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है

- शंकर लाल, इंदौर मध्यप्रदेश

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