मीनाक्षी भालेराव की कविता - जीवन

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जीवन

सूर्य की तरह उदय होता सा

जीवन चाहता है हर कोई पर

अंधकार की तरह आंसुओं से

भरा जीवन जीना पड़ता है

हरे-भरे खेत-खलियानों सा

लहराना चाहता है हर कोई

पर उजड़े हुये जंगल सा

पतझड़ सा जीवन मिलता है

पहाड़ की चोटी को छूना

चाहता है हर कोई और

अपने उदेश्यों का झंडा फेरना

चाहता है हर कोई पर उसे

कुएं खोदने का काम मिलता है

खुदा तेरे जहाँ में ये कैसा इंसाफ है

किसी को मकाम और किसी को

राहों की ठोकरें मिलती हैं

 

पाषाण युग

शताब्दियाँ बीत गयी हैं

परिवर्तन और पाषाण युग से

सुसंस्कृत युग तक पहुंचने में

पर क्या हम कुछ बदल पाए है

सदियों पहले मानव आवरण

विहीन रहता था पर भावना

विहीन नहीं हुआ करता था

आज हम नग्नता की होड़ में

आगे हैं पर भावनात्मक होड़ में

पिछड़ गये हैं युगों-युगों का

बदलाव साक्षी है के तब नग्नता

समाज के लिए अभिशाप नहीं थी

आज की नग्नता अभिशाप ही नहीं

वरन विनाश कारी भी है

 

शब्दकार

सरहदों को तोपों से बाँटने वालों

उन ईन्सानों से कुछ तो सीखो

जो शब्दों से सरहदों को जोड़ते हैं

शब्दकार तो सृष्टि का रचयिता है

साक्षात भगवान को किसने देखा है

इन्सान ने तो वही जाना है जो

साहित्यकारों , इतिहास करो ने लिखा है

किसने देखा सृष्टि का उत्थान

पल-पल जो घटता है पन्नों पर उतरता है

अपनी कलम से इतिहास लिख डालता है

दिल में घटना चक्रों का तूफान लिए

हाथों में कलम लिए फिरता है कलम धारी

फिर भी है उस के हाथ ख़ाली के ख़ाली

भरता नहीं घर अपना काली कमाई से

करता नहीं फिरता है झूठे वादे दुनिया में

करता है सेवा बांटता है ज्ञान बिना मोल लिए

गीता, कुरान;रामायण हो या हो बाइबिल

या हो ग्रंथों से बड़े कोई ग्रन्थ या पुराण

रचनाकार ही इन सब का हकदार है

मिलना उस को चाहिए पूरा सम्मान चाहिए

 

वीर जवानों

मेरे देश के वीर जवानों

खुद को तुम पहचानो

तुम छा जाओ अम्बर पर

बादलों की तरह

सागर पर किनारों की तरह

वीरानों में आबादी की तरह

फजाओं में मौसम की तरह

तुम छा जाओ ममता में

माता की तरह

आंचल में शिशु की तरह

अँधेरे में उजालों की तरह

मुसीबत में सहारों की तरह

तुम छा जाओ किताबों में

पन्नों की तरह

इतिहास में शब्दों की तरह

वीरता में देश भक्तों की तरह

सरहदों पर दीवारों की तरह

मेरे-------------------------------

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4 टिप्पणियाँ "मीनाक्षी भालेराव की कविता - जीवन"

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