शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

एस. के. पाण्डेय के हास्य-व्यंग्य दोहे

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दोहे-(४)

यसकेपी जिस तंत्र में नेता रहें स्वतंत्र।
त्रस्त रहे परजा बहुत तंत्र सो प्रजातंत्र।।

यसकेपी होते रहैं नेता मालामाल।
जनता की होती रहे खसता मालीहाल।।

पैसा और जुगाड़ का चलता जिसमें खेल।
यसकेपी बहु बेचते धरे योग्यता तेल।।

बेकारी बढ़ती रहे दिनों-दिन रेलमपेल।
यसकेपी कुर्सी मिले जो हो पहली फेल।।

जनता की नहि कहुँ चले जो कहलाते आम।
यसकेपी उनकी चले जेब भरे जो दाम।।

यसकेपी जो भर सके भर ले झोली ठूँस।
खाते चलें बिदेश में जनता से लै घूस।।

नेता कहते जेल में चलता अपना खेल।
यसकेपी जलदी मिले अपराधी को वेल।।

प्रजातंत्र में लूट है लूट सके जो लूट।
यसकेपी शेयर मिलै नहीं पड़ेगी फूट।।

शेरू कहैं सियार से छोड़ो अपनी टेक।
वोट हमी को दीजिए बने रहेंगे नेक।।

बम चले जो हारे हम रम जाएँ जो जीत।
यसकेपी हम तो सही नहि केहू के मीत।।

चूहे से बिल्ली कहे दीजे अपना वोट।
छोडूँगी उनको नहीं जो देते हैं चोट।।

वोट हमी को दीजिए हम हैं तेरे नात।
यसकेपी चैतू कहैं एक हमारी जात।।

धन्नू कहते भूलिए भैया सारी खोट।
नोट के बदले दीजे हमको अपना वोट।।

भैया जिते चुनाव जो हुए आम से खास।
यसकेपी नहि आम को आने देते पास।।

यसकेपी जो खास भे उनके लगी खवास।
खाते-खाते थक गए पूरी नहि अभिलास।।

आम आम ही रह गए हुए और कंगाल।
यसकेपी कह खास अब कहाँ छिपावों माल।।

चींटी खाए चुकत है कहते लोग पहाड़।
यसकेपी नेता घने सच में देश उजाड़।।

नेता कहते राखिये लोकतंत्र की लाज।
यसकेपी चूँ मत करो गिरती जाए गाज।।

यसकेपी नेतन मते लोकतंत्र को सार।
लोक जाय परलोक को बची रहे सरकार।।

यसकेपी इस तंत्र की कही न जाये बात।
कहने से कुछ कर भला उर लागत आघात।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
                         समशापुर (उ. प्र.)।
      URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/
           ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

                                   *********

(चित्र- अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा पटना की कलाकृति)

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