मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - पागल मालिनी

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पागल मालिनी

एक मालिनी थी। उसने एक ऐसा पौधा रोपा था जो उसके जीवन का अहम हिस्सा बन गया था। मानों वह पौधा, पौधा न होकर उसी के शरीर का एक अंग था। हमेशा उसी के देख-रेख में लगी रहती थी।

जब हवा के बहुत तेज झोके चलने लगते थे तो वह उसे पकड़कर बैठ जाती थी। उसे डर था कि कहीं हवा के तेज झोंके उसे तोड़कर उड़ा न ले जाएँ।

कहीं कोई पशु उसे अपना ग्रास न बना ले। इस डर से उसने बाड़ लगा रखा था। रोज बाड़ में कुछ न कुछ सुधार किया करती थी।

जब पानी नहीं मिलता था तो वह उसे अपनी आँसुओं से सीचती थी। खुद प्यासी रहकर पौधे को सीचा करती थी।

तेज धूप में पौधा झुलस न जाये। इस डर से जेठ की दुपहरी में अपने आँचल की छाया करके खड़ी रहती थी। दुआएँ माँगती रहती थी।

उसका पूरा जीवन उसी पौधे को समर्पित था। वह सोचती थी कि जब यह बड़ा वृक्ष बन जायेगा तो इसकी छाया में मैं अपनी जिंदिगी हँसी-खुशी गुजार दूँगी।

समय गुजरते देर नहीं लगती। देखते-देखते पच्चीस वर्ष बीत गए। पौधा वृक्ष बन गया।

उसकी घनी छाया हो गई। फल आने लगे। मालिनी की खुशी का ठिकाना न रहा।

लेकिन कुछ समय बाद वहाँ एक ऐसी मालन आई। जिसने धीरे-धीरे वृक्ष को अपना लिया। बोली यह मेरा है। इस पर मेरा तुझसे ज्यादा अधिकार है। और मालिनी को वृक्ष की छाया से भी बंचित कर दिया।

मालिनी पागल हो गई।

लोग आज भी पागल मालिनी की कहानी कहते और सुनते हैं। लेकिन उसके पागलपन व दर्द को कोई विरला ही समझता है।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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3 blogger-facebook:

  1. अदभुद...
    हर माँ इस दर्द को महसूस कर सकती है..

    उत्तर देंहटाएं
  2. दीप्ति मित्तल8:41 pm

    ऐसे दर्द से सामना न हो, इसीलिए प्यार को आसक्ति और अपेक्षाओं से रहित रखने को
    कहा जाता है। मगर माता-पिता खासकर मॉ ऐसा नही कर पाती। वो तो बेटे के साथ
    साथ अपेक्षाओं के वृक्ष को भी बडा करती है और जब मनमुताबिक नही होता तो दुखी
    हो जाती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut hi acchi..

    manjari

    manjarisblog.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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