रविवार, 26 फ़रवरी 2012

मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया – एवरेस्ट की चुनौती

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एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान

भूमिका

संसार के सबसे ऊंचे पर्वत एवरेस्ट को चढ़ाई पूरी करने के बाद से मेरी हमेशा यह इच्छा रही कि बच्चों के लिए इस विषय पर एक किताब लिखी जाय। कारण यह कि बचपन ही वह समय होता है जब दुनिया में कुछ कर गुजरने की इच्छाएं मन में पैदा होती हैं और अगर सही मार्गदर्शन जिसमें पढ़ने के लिए सही किताबें मिल पाना भी शामिल है-मिल जाए तो ये इच्छाएं अक्सर पूरी भी हो जाती हैं। जब से मेरी अंग्रेजी की किताब 'हायर दैन एवरेस्ट' सफल हुई, तब से यह इच्छा और ' भी बढ़ी, और मुझे खुशी है, इस पुस्तक के रूप में आज यह इच्छा पूरी हो रही है।

हर बच्चा मन में सोचता है कि लोग पहाड़ पर क्यों और कैसे चढते हैं। मेरी इस पुस्तक से उन्हें इस बात का जवाब मिल जायगा। जिन बच्चों को यह जवाब मिल जाता है, उनके लिंए जिंदगी का एक नया द्वार खुल जायेगा और उसके खुलने से न्छुइऐ भो पहाड़ों पर चढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

( हरिपालसिंह अहलूवालिया )

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समर्पण

बंटी

पाली

निशा

सोनू

हन्नू

राजा

और हिन्दुस्तान के दूसरे सभी

बच्चों के नाम

पर्वतारोहण में मेरी रुचि

अपने बचपन को सबसे पहली याद मुझे शिमला की आती है। उस समय मैं चार या पांच साल का ? ? था। हम एक छोटे-से काटेज में रहते थे जो शहर के बाजार से करीब तीन-चार मील दूर था। मैं अपनी मां के साथ खरीद-फरोख्त करने बाजार जाता और अपने छोटे-से थैले में सब्जियां और फल लेकर घर आता था। मुझे बाजार की सीधी चढ़ाई चढ़ने और वहां से घर लौटते हुए तेज ढाल पर दौड़कर उतरने में बड़ा मजा आता था।

मैं इतवार और दूसरी छुट्टियों की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करता क्योंकि तब हम सब भाई-बहन मिल- कर शिमला के दूसरे भागों में अपने संबंधियों से मिलने जाते। अक्सर हम अपने नाना के घर भी जाते थे जो एक दोमंजिले मकान की दूसरी मंजिल पर रहते थे। मेरे नाना भारतीय सेना में डाक्टर थे। वे बहुत धार्मिक व्यक्ति थे और अपने पेशे पर उन्हें बड़ा गर्व था। वे सबेरे चार बजे उठ जाते, पहले वे ठण्डे पानी से नहाते, पूजापाठ करते और फिर टहलने चले जाते। साढ़े सात बजे तक वे घोड़े पर बैठकर अपने मरीजों को देखने चले जाते। उनका सुनहरे रंग का घोड़ा बड़ा कद्दावर और शानदार था। उनके पास एक सुनहरा स्पेनियल कुत्ता भी था जो हमेशा उनके साथ रहता था। मैं भी कभी-कभी उनके घोड़े पर सवारी गांठता- लेकिन उस वक्त सईस हमारे साथ रहता था।

'मेरे परनाना, जो पहले सेना में थे और अब रिटायर हो चुके थे, स्यालकोट जिले में हमारे पुरखों के गांव महलोवाल में रहते थे। मेरे नाना और परनाना दोनों ही पहले और दूसरे विश्व-युद्धों में लड़ चुके थै। उन्हें कई इनाम औंर तमगे भी प्राप्त हुए थे।

अपने पिता की भांति मेरी मां भी बहुत धर्म- परायणा और अनुशासन के मामलों में बहुत सख्त हैं। हमारे बचपन में उनकी हमेशा यही कोशिश रहती थी कि हम सब सत्यवादी बनें। मामूली-से झूठ से भो वे बहुत परेशान और दुखी हो जाती थीं। मैंने उन्हें पूजा के वक्त अक्सर यह प्रार्थना करते सुना है, ''हे ईश्वर, तुम्हीं ने मुझे ये बच्चे दिए हैं और तुम्हीं उन्हें सत्यवादी और अच्छा बनाओ। वे जिंदगी में अच्छे काम करें और मैं गर्व से फूली न समाऊं! ''

हमें सर्दियों का हमेशा बड़ा इंतजार रहता, क्योंकि तब चारों तरफ ताजी खुशनुमा बर्फ फैल जाती और उसमें हम खुश होकर तरह-तरह के सर्दियों के खेल खेलते। हम बढई को मदद से, जो पड़ौस 'में ही रहता था, लकड़ी के डिब्बों को जोड़-तोड़कर स्लेजें बनवा लेते और उनमें बैठकर उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले एस्कीमो जाति के लोगों की तरह बर्फ पर मजे से फिसलते। एक दफा बहुत जोर की बर्फ गिर चुकने के बाद मैं स्लेज 'पर अपनी बहिन को बिठाकर ढलान पर फिसलता जा रहा था। स्लेज की रपतार इतनी तेज हो गयी कि वह हम दोनों को लिए उलटकर लुढ़कती-पुढ़कती नीचे जा गिरी। हालांकि हमें ज्यादा चोट नहीं आई मगर मेरी बहन बहुत डर गयी और उसके बाद मेरे साथ स्लेज पर बैठना कभी स्वीकार नहीं किया।

कुछ समय बाद मेरे पिताजी की बदली लाहौर हो गयी और हमें लाहौर जाना पड़ा मेरे दादा भी नौकरी से रिटायर हो गए और वे भी हमारे साथ रहने के लिए लाहौर चले आए। अपने दूसरे भाई-बहनों के साथ हम एक प्राइमरी स्कूल में भरती कराए गए। लेकिन मुझे लाहौर पसंद नहीं आया और मैं पहाड़ वापस जाने की ही कामना करता रहा, क्योंकि वहां खूब उछल-कूद कर सकता था।

हमें गांव की जिंदगी की बिलकुल जानकारी नहीं थी। इसलिए हमारी मां ने हमें महलोवाल भेजने का निश्चय किया जहां हमारे परनाना अभी भी रहते थे। मेरे साथ मेरी बहनें और बुआ भी गयीं। लाहौर सेहम रेल से रवाना हुए और नरोवाल पहुंचे। फिर हम तांगे पर बैठकर रबगांव पहुंचे। रब के बाद हम खच्चरों पर बैठकर आगे चले। बरसात के कारण कच्ची सड़कों पर कीचड़ हो गयो थी और कई जगह तो सड़क बिलकुल ही बह गयी थी। मुझे खच्चर की सवारी अच्छी नहीं लगी, लेकिन मेरी बुआ बड़े मजे से खच्चर पर बैठकर आगे चलने लगीं और उन्हीं की देखादेखी मै भी हिम्मत बांधकर सवार हो गया। कुछ दूर चलने के बाद मेरा डर थोड़ा दूर हुआ लेकिन तभी एक उथली तलैया को पार करते हुए खच्चर थप्प से पानी में बैठ गया। मैं सिर से पैर तक भीग गया और जबर्दस्ती खच्चर की सवारी कराने के लिए अपनी बुआ को बुरा-भला कहने लगा। इसके बाद घर पहुंचने तक मैं खच्चर पर नह्रीं बैठा और भीगी निकर पहने हुए हो पैदल चलता रहा। झुटपुटा होने पर हम महलोवाल पहुंच। हमारे परनाना घर के बाहर कुएं के पास एक आराम कुर्सी डाले हमारा इन्तजार कर रहे थे। ९४ साल की लम्बी उम्र के बावजूद वे बहुत तंदुरुस्त और खुश नजर आए। गांव बहुत शांत था और उसमें तरह-तरह के फलों के बगीचों की भीनी- भीनी खुशबू चारों तरफ फैली हुई थी। हमारा पुरखों का यह घर बहुत बड़ा था और उसमें एक काफी बड़ा अहाता भी था। मेरे नाना गांव के लम्बरदार थे जो वहां के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण पद था।

शाम को हम अपने ही घरके चकोतरों और आमों के बागों में घूमने गए। मुझे घर में इधर-उधर घूमने में भी बड़ा मजा आया क्योंकि वहां मेरे नाना और परनाना के तरह-तरह के हथियार और पुराने ढंग की दूसरी बहुत-सी चीजें जहां-तहां रखी हुई थीं। बंदूकें थीं, राइफलें थीं, पिस्तौलें और भाले थे, चीनी गिट्टी के बर्तन थे, तांबे के बड़े-बड़े जानवर थे और अनेक प्रकार के गुलदान थे। ये चीजें ज्यादातर विदेशों से आई थीं। गेरे नाना भरतपुर महाराज के निजी डाक्टर रहे थे और उन्हें बहुत-सी चीजें भेंट के तौर पर भी मिलती रहती थीं। ये सब चीजें कायदे से कमरों में सजी थीं। एक तलवार थी जिसकी मठ सोने की बनी थी।

यह तलवार महाराज रणजीतसिंह के एक सरदार की थी। एक अचकन थी जिस पर खूबसूरत जरी का काम था। इसी को पहनकर नाना दरबार में जाते थे।

इस तरह हमने खेलते-कूदते गांव में एक पखवाड़ा बिताया और लाहौर की गर्मी और वहां की सड़कों की धूल फांकने वापस आ गए।

1949 का साल आया और लाहौर में साम्प्रदायिक तना-तनी फैलने लगी। कई बार उपद्रवों के कारण स्कूल आधे या पूरे दिन बंद रहते। स्कूल जाना दिनों- दिन मुश्किल होता गया। इसो बीच पिताजी को भी बदली देहरादून हो गयी और वे हमें पढाई का यह साल पूरा करने लाहौर में छोड़कर देहरादून चले गए। तनाव बढ़ता रहा। सीमा आयोग ने तय किया कि विभाजन के बाद पाकिस्तान नामक जो नया राज्य बनेगा लाहौर को उसमें मिला दिया जाएगा। बड़ी कठिनाइयों के बाद हम लाहौर छोड़कर देहरादून पहुंचने में सफल हुए। वहीं कुछ समय बाद हमारे परनाना और दूसरे बुजुर्ग भी आ गए। उन्हें विभाजन से इतना जबर्दस्त धक्का लगा कि वे सौ साल जीवित रहने की अपनी इच्छा पूरी न कर सके और ९६ साल को उम्र में ही चल बसे। देहरादून की सेण्ट जोसेफ अकादमी में मुझे चौथे दर्जे में दाखिल कराया गया

और मेरे ममेरे भाई को तीसरे दर्जे में। मेरी बहनों को कान्वेण्ट में पढ़ने भेजा गया। देहरादून के चारों तरफ भी पहाड़ियां थीं, इसलिए मुझे यह शहर अच्छा लगा। यहां हमारे कुछ दोस्त भी बन गए। इनमें एक रस्किन बांड था, जो बाद में मशहूर लेखक हुआ। एक इतवार हम सब इकट्ठे हुए और राजपुर से मसूरी पैदल जाने का प्रोग्राम बनाया। राजपुर देहरादून से ८ मील दूर है और यहीं से मसूरी के लिए चढ़ाई शुरू होती है। हम साइकिलों से राजपुर गए और उसके आगे पैदल चले। चढ़ाई बहुत मुश्किल थी, लेकिन रास्ते के दोनों ओर खूबसूरत जंगल और कई झरने भी थे। चढ़ाई का पहला टुकड़ा जरा मुश्किल था लेकिन उसे पार करते ही ताजे पानी के एक झरने के बगल में एक दुकान आयी। एक पहाड़ी यह दुकान चलाता था। मैंने कहा, ''ताज्जुब है कि इस जंगल में यह आदमी अपने पूरे परिवार के साथ रह रहा है! '' इस पर रस्किन ने कहा, ''अरे, यह पहाड़ी इन बातों के आदी होते हैं।'' दुकानदार के पास एक बकरी एक गाय और एक छोटा-सा कुत्ता भी था। मैंने कहा 'मेरा ख्याल है, यह कुत्ता इसके घर की निगरानी करता है।'' रस्किन ने जवाब दिया, ''वह कम से कम बकरी और गाय की देरवभाल तो कर ही सकता है।''

चढ़ाई का दूसरा टुकड़ा बहुत सीधा नहीं था और और पेड़ों के घने झरनों के बीच हम बड़े मजे से चढते चले गये। यहां से नीचे देखने पर राजपुर से मसूरी जाने वाली पक्की सड़क साफ दिखाई देती थी। हम 'ओक ग्रोव' से गुजरे जो भारत के रेल विभाग द्वारा चलाया जाने वाला एक स्कूल है। इसके बाद इसी रास्ते पर कुछ और आगे सेण्ट जार्ज कालेज है। इस कालेज पर एक बड़ी विशाल घड़ी लगी है और इसका भवन बहुत शानदार दिखाई देता है। मसूरी में कई पब्लिक स्कूल हैं। दोपहर के भोजन के समय तक हम मसूरी के लंडौर बाजार पहुंच गए जहां हमने पूरियां और चने की गरमागरम सब्जी खाई। चढ़ाई की थकान के बाद खाना खाकर बड़ा मजा आया। अब चूंकि हमें अंधेरा होने से पहले ही घर भी पहुंच जाना था, इस- लिए हम फौरन ही वापस लौट पड़े। हालांकि मुझे बेहद थकान आ गई, मेरे पैरों में घट्टे पड़ गए और सारे बदन में दर्द होने लगा, लेकिन इसने ऐसी यात्राओं के लिए मेरे मन में बड़ी उमंग पैदा कर दी। मैं चाहने लगा कि मैं और भी ऐसी यात्राएं करूं। समय-समय पर मैंने ऐसी यात्राएं कीं और कई दफा तो मैं बिना किसी संगी-साथी के अकेला ही निकल पड़ता था।

इस तरह मेरे मन में ऊंची से ऊंची चढाइयों पर जाने की तीव्र लालसा पनपने लगी। बहुत बचपन में शिमला में रहते हुए मेरे मन में पहाड़ों के प्रति जो एक अनोखा प्यार पैदाहुआ था, वह भी तेजी से बढ़ने लगा। उस वक्त मैं क्या जानता था कि मैं ऐसी चढाइयों पर जाऊंगा जहां बर्फ कभी नहीं पिघलती! मेरे मन में यह इच्छा जन्म लेने लगी कि मैं इस रहस्य का पता लगाऊं कि इन पहाड़ों के भीतर क्या है? मैं साइकिल से या पैदल ही ऐसी जगहों को जाने लगा जिनके दृश्य मुझे दूर से सुन्दर लगते थे '। इसके साथ ही मेरी रुचि फोटोग्राफी में भी उत्पन्न' हुई और मैं एक छोटे-से कैमरे से इन जगहों के फोटो खींचने लगा। यह कैमरा मुझे मेरे पिताजी ने दिया था।

सेण्ट जोसेफ एकेडेमी में अपने स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने मसूरी के सेण्ट जार्ज कालेज में दाखिला ले लिया। कालेज में मेरी पढ़ाई ठीक से होती रही और पहाड़ों की यात्रा, बर्फ पर फिसलना तथा फोटो खींचना इत्यादि कार्यों में मेरी रुचि निरंतर बढ़ती रही। एक बार मुझे पर्वतारोहियों का एक दल मिला जो चढ़ाई पूरी करके वापस लौट रहा था। उनके अनुभव सुनकर मैं बहुत रोमांचित हुआ। उन्होंने कुछ बर्फ से ढके पहाड़ों की चढ़ाई पूरी की थी और वे अपनी चढ़ाई की ही ड्रेस पहने हुए थे। आइस ऐक्स ( बर्फ काटने को कुल्हाडियां ) उनके हाथों में थीं, वे खास किस्म के बूट पहने थे और उनके कंधों पर कैन्वस के बड़े झोले थे। मैं इतना रोमांचित हुआ कि मैंने उनके बूट और थैले छू-छूकर देखे और बर्फ काटने की कुल्हाड़ी भी हाथ में लेकर उसे हवा में घुमाया। तब मुझे क्या पता था कि पहाडों पर चढ़ने वालों के लिए यह हथियार कितना जरूरी है!

अब तक मैंने पुस्तकालयों से पर्वतारोहण संबंधी पुस्तकें लेकर पढ़ना भी शुरू कर दिया था। मैं चट्टानों पर चढ़ने से संबंधित आवश्यक बातों की जानकारी देने

वाली पुस्तकें लेता और बड़े चाव से पढता था। मैंने तेनजिंग नोर्के लिखित 'टाइगर ओफ स्नोज' नामक पुस्तक भी खरीदकर पढ़ी। तेनजिंग के जीवन चरित्र से, विशेषकर शेरपाओं के देश में उसके आरंभिक जीवन का घटनाओं से, मुझे बड़ी प्रेरणा मिली।

मसूरी में कालेज की पढ़ाई पूरी करगे मैं देहरादून की इंडियन मिलिटरी एकेडमी में दाखिल हो गया। यहां दो साल की ट्रेनिंग पूरी की। यह जीवन बहुत व्यस्त और कठोर था। लेकिन चूंकि मुझे देहरादून पसंद था इसलिए मैंने इन कठिनाइयों का कोई ख्याल नहीं किया। मैं जानता था कि सैनिक शिक्षा से मेरा शरीर बहुत हृष्ट-पुष्ट हो जाएगा जिससे मुझे आगे चलकर ऊंचे पहाड़ों की चढ़ाई करने में बड़ी मदद मिलेगी।

१९५८ के दिसम्बर महीने में मैं इलेक्ट्रिकल एण्ड मैकेनिकल इंजीनियरिंग कोर में भरती हो गया और मोटरगाड़ियों के इंजनों के बारह महीने का कोर्स पूरा करने के लिए सिकंदराबाद चला गया। सिकंदराबाद बडी खूबसूरत जगह है, पर पहाड़ न होने के कारण मुझे यहां रहने में मजा नहीं आया। मुझे याद है, एक बार हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल, ब्रिगेडियर ज्ञानसिंह, सिकंदराबाद आए और

और उन्होंने पर्वतारोहण पर एक भाषण दिया। यह 1960 का जनवरी का महीना था और इसके एक ही महीने बाद उन्हें एवरेस्ट पर्वत पर चढ़ाई करने वाले भारतीय दल का नेतृत्व करना था। उनका भाषण सुनने बहुत से लोग एकत्रित हुए। उन्होंने अपने ' भाषण के साथ स्लाइडें दिखाईं और काल ऑफ दि माउंटेन्स' नामक फिल्म भी दिखाई। सिकंदराबाद के मेरे एक साल के निवास काल में यह मेरे लिए सबसे रोमांचक घटना थी। भाषण के तुरंत बाद मैं ब्रिगेडियर साहब से मिला और उनसे पूछने लगा कि मैं दार्जिलिंग के पर्वतारोहण संस्थान में किस तरह भरती हो सकता हूं। वे बड़े प्यार से मुझसे मिले और इस काम के लिए मुझे बहुत उत्साहित भी किया। उन्होंने पर्वतारोहण संस्थान में भरती होने के लिए मुझे एक दाखिले का फार्म भी दिया जिसे भरकर मैंने तुरंत दार्जिलिंग भेज दिया। ये दाखिला पर्वतारोहण के आरंभिक कोर्स के लिए था।

सिकंदराबाद का कोर्स पूरा करने के बाद पहली बार मैं एक ऐसी जगह तैनात हुआ जो कश्मीर में थी। पहाड़ों में लौट आने की मुझे बहुत खुशी हुई। यहीं मुझे यह सूचना मिली कि मैं दार्जिलिंग के संस्थान में भरती किया जा सकता हूं। लेकिन जब मैं अपने कमांडिंग आफिसर कर्नल कपूर से आज्ञा लेने गया तो उन्होंने इन्कार कर दिया। उनका कहना था कि मेरे जैसे तकनीकी आदमी के लिए पर्वतारोहण की ट्रेनिंग निरर्थक और समय की बरबादी है। इसके बदले, उन्होंने कहा, मैं अपने ही तकनीकी क्षेत्र में कोई ऐसा कोर्स करूं जिससे मेरे कैरियर में मदद मिले। कर्नल कपूर ने कहा-''बयालिस दिन के कोर्स का मतलब है यूनिट से करीब-करीब दो महीने बाहर रहना। '' ''जी'', मैंने धीरे से कहा। कर्नल कपूर बड़ी देर तक मुझे समझाते रहे कि ऐसा करना गलती ही होगी। लेकिन अंत में उन्होंने कहा-''पर चूंकि आपको इस काम में बड़ा उत्साह है, इसलिए अगर आप अपनी सालाना छुट्टी को छोड़ने के लिए_ तैयार हों तो मुझे आपको जाने देने में कोई एतराज नहीं।'' ''जी,'' मैंने फिर कहा। लेकिन इस बार मेरी 'जी' में आज्ञा प्राप्त कर लेने की खुशी शामिल थी। मैं दार्जिलिंग के लिए चल पड़ा। ढाई दिन के सफर के बाद मैं दोपहर बाद सिलीगुड़ी पहुंचा। एक छोटी-सी पहाड़ी रेल सिलीगुड़ी से दाजिंलिंग जाती है। यह रेल चूंकि बहुत धीरे चलती है इसलिए मैंने बस से जाने का निश्चय किया। हरी-भरी पहाड़ी दृश्यावली के बीच दो घंटे सफर करके आखिरकार मैं दार्जिलिंग पहुंच गया।

कई जगह बल खाती हुई सड़क से होता हुआ मैं पर्वतारोहण संस्थान के फाटक पर जा लगा। यहां से कंचनचंगा को पर्वतमाला आकाश में सिर ऊंचा किए खड़ी दिखाई देती थी। मुख्य द्वार पार करने के बाद जो पहली चीज मुझे नजर आई वह थी चट्टान पर चढ़ते हुए एक आदमी को मूर्ति। इस पर लिखा है, 'हम एक के बाद दूसरे शिखर पर चढते चलें'-यही संस्थान का मोटो ( ध्येय-वाक्य ) भी है।

पर्वतारोहण के इस प्राथमिक कोर्स में विभिन्न क्षेत्रों से आये हम ३० विद्यार्थी थे। कोर्स बिग्रेडियर ज्ञानसिंह के एक भाषण से, जिनसे मैं पहले मिल चुका

था, आरंभ हुआ। हमें पहले आरंभिक बातों की जानकारी और शरीर को तगड़ा बनाने और हिम्मत लाने के लिए दार्जिलिंग में एक सप्ताह बिताना था। इसके बाद हमें बेस कैम्प की यात्रा करनी थी, जहां हमें बर्फ संबंधी विशेष ज्ञान और चढ़ाई की ट्रेनिंग दी जानी थी। तेनजिंग नोर्के और दूसरे शेरपा शिक्षकों से मिलकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ।

दार्जिलिंग में एक हफ्ता बिताकर हम बेस कैम्प के लिए चले। पहले दिन दार्जिलिंग से नया बाजार तक हमने छ: हजार फीट को उतराई पूरी की। हम हर रोज नदी के किनारे मैदानों में पांच-छ: घंटे चलते। तीन मार्च को हमने सिक्किम में प्रवेश किया। यहीं से खड़ी चढ़ाई आरंभ हुई और दुर्भाग्यवश मेरे बायें घुटने में तेज दर्द होने लगा। हर कदम के साथ यह दर्द बढता ही जाता था। कुछ समय के बाद खड़ा रहना भी मुश्किल हो गया। मैं सोचने लगा कि मैं क्या करूं, कि तभी एक जीप मेरे पास आकर रुकी। उसमें तेनजिंग बैठे हुए थे।

''क्या बात है? '' उन्होंने पूछा।

''मेरे बायें घुटने में तेज दर्द शुरू हो गया है,'' मैंने उत्तर दिया।

मेरे सूजे हुए घुटने की ओर उन्होंने नजर डाली

और पूछा, ''दर्द बहुत ज्यादा है क्या? ''

''जी, जब मैं चलता हूं, तब बहुत तेज दर्द होता है।''

तेनजिंग कुछ देर चुपचाप खड़े कुछ सोचते से रहे, फिर पूछने लगे, ''ऐसा दर्द क्या पहले भी कभी हुआ है? ''

''नहीं, कभी नहीं हुआ। ''

''तुम वापस जाना चाहोगे? '' तेनजिंग ने पूछा।

''दो और छात्र हैं, जो चढ़ नहीं सकते और वापस जा रहे हैं। लौटते हुए यही जीप उन्हें वापस ले जाएगी।

तुम भी जाना चाहो तो उनके साथ ही जा सकते हो। ''

मेरे लिए यह एक महत्वपूर्ण निश्चय का क्षण था।

यदि मैं इस समय वापस चला जाता तो मेरा पर्वतारोहण का सपना खत्म हो जाता और मेरी सभी आशाएं मिट्टी में मिल जातीं।

''नहीं, मैं वापस नहीं जाना चाहता, '' मैंने उत्तर दिया।

तेनजिंग ने पहाड़ी की तरफ इशारा किया और कहा, ''यह पहाड़ी देखते हो? तुम्हें इस पर चढना पड़ेगा और यह तीन हजार फीट ऊंची है। क्या तुम इस पर चढ़ सकोगे? ''

क्या जबाव दूं, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था।

तेनजिंग ने मल्हम की एक छोटी-सी डिबिया निकाली और मुझे यह मल्हम घुटने पर लगाने को कहा।

''कुछ मिनट बाद तुम चलने को कोशिश करना और अगर तब भी यह दर्द दूर नहीं होता तौ तुम्हें लौटना ही पड़ेगा। '' इसके बाद वे चले गए, लेकिन अपने पीछे मेरे साथ एक शेरपा छोड़ गए।

मैंने घुटने पर उनका दिया मल्हम लगाया, पट्टी बांधी और धोरे-धीरे चलना शुरू किया। दर्द काफी घट गया था और इससे मुझे बहुत आश्चर्य और प्रसन्नता हुई। शेरपा को सहायता से मैंने पहाड़ी पर चढ़ना शुरू कर दिया और कुछ समय बाद ताशीडिंग पहुंच गया। पहाड़ी की चोटी पर यह एक छोटा-सा गांव था जहां एक स्कूल और बाजार भी था। रात को हम स्कूल के बरामदे में सोये। सोने से पहले मैंने घुटने पर थोड़ी-सी मल्हम और लगाई। सवेरे तक दर्द बिलकुल खत्म हो गया। यह मेरे जीवन का बहुत महत्वपूर्ण दिन था। पर्वतारोही के रूप में मेरा भविष्य इसी दिन निश्चित हुआ।

वसंत की शुरुआत थी और पहाड़ी फूलों से ढंकी हुई थी। चारों तरफ तरह-तरह के फूल अपनी शोभा बिखेर रहे थे। हमें रास्ते में नारंगियों के कई बाग भी मिले। एक बाग में घुसकर हमने कुछ फल भी खाये। मेरे साथ वाले शेरपा ने मुझे बताया कि यह बाग एक लामा का है और हमें इन फलों के पैसे चुकाने चाहिए। शेरपा बाग के भीतर गया और लामा के लड़के को साथ लेकर लौटा। लड़के को हमने एक रुपया दिया और कहा कि हमने बीस नारंगियां खायी हैं। लड़का हमें इंतजार करने को कहकर भीतर चला गया और कुछ देर बाद नारंगियों से भरा एक टोकरा लेकर लौटा। उसने कहा-''हम एक रुपये की पचास नारंगियां देते हैं और इस टोकरे में तीस नारंगियां और हैं।'' हम इन लोगों की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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