शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

दीप्ति मित्तल की कविता - मेरी तन्हाई

दीप्ति मित्तल 

मेरी तन्हाई                                       (3-2-12)


ऐ मेरी दोस्त, मेरी तन्हाई,          
बावफा तुझ सा कोई और नहीं,
हर घड़ी साथ मेरे रहती है,
तेरे नाते का कोई तोड़ नही,

मेरी हमराह, तेरे सदके मैं,
मेरी हर रात का है किस्सा तू,
चाह कर भी ज़ुदा ना कर पाऊँ,
मेरी आदत का ऐसा हिस्सा तू.

जिन्दगी की हसीन राहों में,
कितने साथी मिले और छूट गये,
रिश्ते-नाते बने यहाँ जो भी
कुछ निभे और बहुत से टूट गये,

पर खड़ी साथ मेरे तू ऐसे,
जैसे पर्वत जमीं से हिलता नहीं,
तेरे जैसा बावफा साथी,
चिराग लेके ढूंढे से भी मिलता नही।

ऐ मेरी दोस्त, मेरी तन्हाई,
मुझको अब तू बहुत ही भाती है
अब किसी और की दरकार हो क्यूं
तू मेरे रंजो-गम की साथी है।

--------------------------------

        नजर का फर्क

क्यों लगता है अक्सर एक बाप को,
देख कर अपनी ही औलाद को...।
जैसे वो कम्बख्त, फिजूल, आवारा है,
निकम्मा है, अहमक है, नाकारा है।
बाप की इज्जत नहीं, मां का खयाल नहीं,
ऊपर से गलतियों का मलाल नहीं।
एक दिन बेड़ा गर्क करायेगा।
अपने पुरखों का नाम डुबायेगा।
क्यों लगता है अक्सर एक बाप को
देख कर अपनी ही औलाद को .....


क्यों लगता है अक्सर एक मां को
देख अपने जिगर के टुकड़े, अपनी जां को..।
जैसे लाखों में एक उसका दुलारा है,
चाँद है, चिराग है, आँखों का तारा है।
वह ऊपरवाले की नेमत है, उसका नूर है,
उसकी हर बदमाशी मां को मंजूर हैं।
उससे मां का जहान रोशन हैं,
वो उसका कान्हा है, उसका मोहन है।
उसकी हर आस पूरी करवायेगा,
उसको सोने की सीढ़ी चढवायेगा।
क्यों लगता है अक्सर एक मां को
देख अपने जिगर के टुकड़े, अपनी जां को……

 

संपर्क -           403-डाहलिया, न्याति मिडोज, वडगॉवशेरी                                       
                 पुणे (महाराष्ट्रा), पिन – 411014
   
                 deeptimittal2@hotmail.com              

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------