पारुल भार्गव की कहानी - सगाई

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सगाई कहानी पारुल भार्गव

सगाई

पारुल भार्गव

शाम के 4 बज चुके थे मैं अपने कमरे में बैठी टी.वी. देख रही थी तभी मेरी जेठानी मेरे कमरे में आई और मुझे टी.वी. के सामने पाकर तुनक कर बोल पड़ी- क्‍या रिया तुम अभी तक तैयार नही हुई, तुम्‍हें पता है न हमें रमा की सगाई के लिए जाना है, मैंने घड़ी की तरफ देखते हुए कहां क्‍या भाभी अभी तो सिर्फ 4 बजे है अभी से क्‍या तैयार होना, तभी भाभी बोली तुम्‍हें पता है रमा का रिश्‍ता बहुत उंचे घराने में तय हुआ है सब ‘हाई-प्रोफाइल' वाले लोग है। मैंने अलसाते हुए कहा- ‘तो क्‍या हुआ'। मेरा असाधारण - सा रवैया देख वे एक बार फिर मुझमें जोश भरने के लिए बोल पड़ी - सुना है एक-से-एक लोगों का आना होगा, बुआ जी के तो आज तेवर ही नहीं मिलेंगे, हमें भी अच्‍छे से बन-ठन के जाना होगा। मैंने कहां - हां तो चलेंगे न, हम क्‍या किन्‍हीं रहिशों से कम है ! मेरे यह सुनते ही वे अपने आपको हाई-फाई महसूस करने लगी और जल्‍दी तैयार होने का बोलकर अपने कमरे में चली गई।

मैं थोड़ी देर और टी.वी. के सामने पड़ी रही, फिर जाने के लिए तैयार होने लगी, तैयार होने के बाद कुछ पल के लिए मैं आइने के सामने बैठ कर अपने आप को देखती रही और सोचने लगी कि आज रमा कितनी खुश होगी, इस दिन का इंतजार हर लड़की और उसके परिवार को रहता है, आज बुआजी भी कितनी खुश होंगी कि आज उनकी बेटी का रिश्‍ता उनसे भी उंचे खानदान में और उनकी मर्जी से तय हुआ है आज रिश्‍तेदारों और समाज के सामने बुआजी अपने आपको किसी सिंहासन पर बैठी महारानी से कम महसूस नहीं करेंगी। यह सब सोचने में मैं इतनी खो गई कि मुझे होश ही नहीं रहा कि मेरे मोबाईल की रिंगटोन से पूरा घर गूंज रहा था जैसे ही मेरा ध्‍यान मोबाईल पर गया उसमें अरमान के नाम का मिसड्‌ कॉल अंकित हो रहा था मैंने फोन हाथ में लिया तो वह पुनः बज उठा, मेरे हैलो कहते ही अरमान बोलने लगे ‘रिया तुम अभी तक तैयार नहीं हुई जल्‍दी करो यहां कार्यक्रम प्रारंभ होने वाला है तुम्‍हारा और भाभी का सब इंतजार कर रहे है जल्‍दी आ जाओ। मैंने कहां - हां बस हम आ ही रहे है, मेरे ये कहते ही वे बोले- जल्‍दी आ जाओ और हां वो, वो गुलाबी रंग की साड़ी पहन कर आना जो मैं पिछले ही महीने अपनी शादी की सालगिराह पर लेकर आया था, यह सुनते ही मुझे हंसी आ गयी और मैंने कहां - इतनी जल्‍दी - जल्‍दी में भी तुम्‍हें यह कहना याद रहा, मेरे ये कहने पर वे बोले- ‘अरे उसमें क्‍या हैं तुम्‍हारा ख्‍याल तो मुझे हर पल रहता है , फिर मैंने कहां- जिस तरह तुम्‍हें मेरा ख्‍याल रहता है उसी तरह मुझे भी हर पल तुम्‍हारी पंसद का ही ख्‍याल रहता है और मैंने पहले से ही वही साड़ी पहनी हुई है, ये सुनते ही हम दोनों हंस पड़े।

इतने में भाभी भी तैयार होकर आ गई और मुझे देखकर बोली ‘क्‍या बात है रिया तुम तो आज इतनी सुंदर लग रही हो कि वहां देवर जी का तुम्‍हें देखकर किसी और काम में दिल ही नहीं लगेगा- मैंने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से छुपाते हुए कहा- क्‍या भाभी आप भी न कोई मौका नहीं छोड़ती और हम दोनों ही उस लम्‍हें का मजा लेते हुए रमा की सगाई के लिए निकल गये, घर के ब़ाकी लोग पहले ही समारोह की तैयारियों में हांथ बंटाने के लिए चले गये थे।

वहां पहुंचते ही वहां की चमक-दमक देखकर भाभी इस तरह खुश हो रही थी मानो उन्‍हीं की सगाई का आयोजन किया गया हो। सभी रिश्‍तेदारों का अभिनंदन कर हम एक जगह जाकर बैठ गये, सारी तैयारियां हो चुकी थी और सब कार्यक्रम प्रारंभ होने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन मेरी नजरे तो अरमान को ढूंढ़ रही थी, इतना वक्‍त गुजर जाने के बाद भी जब मैं शादी से पहले किसी भी रास्‍ते से होकर गुजरा करती थी तब भी मेरी नजरों को हरतरफ अरमान का ही इंतजार रहता था और आज भी उस इंतजार में कोई कमी न थी। तभी सगाई का कार्यक्रम प्रारंभ हो गया लेकिन जब तक अरमान मुझे देखकर मेरी तारीफ न कर दें तब तक मेरा मन कहां लगने वाला था। सब कार्यक्रम को देखने में मग्‍न थे, मैं भी रमा को देखकर अपना समय याद कर रही थी कि तभी अरमान एकदम से सामने आकर भाभी से बोले- भाभी रिया को देखकर ऐसी इच्‍छा हो रही है कि एक बार फिर शादी कर लूं। यह सुनते ही मुझे राहत महसूस हुई और मैंने कहां- कहां थे तुम इतनी देर से मैं तुम्‍हें ही देख रही थी। अरमान बोले ‘और मैं तुम्‍हें ही देख रहा था कि तुम्‍हारी नजरें मुझे किस तरह हर तरफ ढुढ़ रही है।

देखते ही देखते सगाई का कार्यक्रम समाप्‍ति की ओर बढ़ने लगा, पूरे कार्यक्रम के दौरान जहां सब लोग वहां कि चकाचौंध और भव्‍यता में खोए हुए थे वही दूसरी तरफ रमा का दिल खुश नहीं लग रहा था, उसके चेहरे पर वो खुशी और आंखो में वो चमक दिख ही नहीं रही थी जो हर लड़की के चेहरे पर इस दिन होती है। वो चुपचाप-सी अपनी नजरें नीची किए खड़ी हुई थी। वहां एकत्रित लोग बारी-बारी से अपनी तस्‍वीरें निकलवा रहे थे। मैं और अरमान भी तस्‍वीर निकलवाने गये तभी मैंने रमा को अपने गले से लगा लिया उसने दो पल के लिए मेरी आंखो में देखा जैसे कि मुझसे कुछ कहना चाह रही हो, मैंने भी उसकी आंखों की नमी को पढ़ लिया था लेकिन वक्‍त और माहौल देख न वो कुछ मुझसे कह पायी और न ही मैं।

पता नहीं क्‍यूं जब से मैंने रमा की आंखो की नमी को महसूस किया था मेरे मन में बैचेनी-सी होने लगी थी और उस बैचेनी को दबाए मैं घर वापस आ गयी, घर आकर जहां सब कार्यक्रम की व्‍यवस्‍था, लड़के वालों के रुतबे आदि बातों में मशगुल थे वही मेरे सामने रमा का वो चेहरा था जिस पर इन सब चीजों के होने के बाद भी खुशी नहीं थीं। मैं वहां से उठकर अपने कमरे में चली गयी, तभी अरमान भी आ गये और कार्यक्रम की ही बाते करने लगे लेकिन मेरा ध्‍यान न पाकर वे समझ गये कि मैं परेशान हूं, तभी मेरे चेहरे पर अपने हाथ रख बोले कि ‘क्‍या हुआ रिया मैं देख रहा हूं तुम वहां भी परेशान थी और अब घर पर भी बात क्‍या है ? यह सुनते ही मैं अरमान के गले से लग गयी और बोली- आज भी तुम मेरी परेशानी को कितनी जल्‍दी पढ़ लेते हो, तभी अरमान बोले- पढ़ कैसे नहीं पाउंगा आखिर मैंने आज तक अपने आप से ज्‍यादा तुम्‍हें जीया है बताओ क्‍या परेशानी हैं। तभी मैंने सबकुछ उन्‍हें बता दिया- थोड़ा सोचने के बाद वे बोले कि अगर तुम्‍हें ऐसा कुछ महसूस हुआ है तो कुछ न कुछ बात जरुर होगी लेकिन हम क्‍या कर सकते है, रमा की अब सगाई हो चुकी हैं तुम ये सब नहीं सोचो सब ठीक होगा !

अगले दिन सुबह से ही मेरा किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था, रह-रह कर मेरी आंखो के सामने रमा का वो चेहरा आ रहा था जो मुझसे कुछ कहना चाहता था, सारे काम छोड़ में मेरे कमरे की खिड़की के पास आकर बैठ गयी, मन में ऐसा तूफान उठ रहा था जो शांत होना ही नहीं चाह रहा था, दिल को महसूस हो रहा था कि कहीं कुछ गलत हो रहा हैं। कहीं न कहीं रमा के रुप में मैं अपने आप को खड़ा पा रही थी, आज मेरी आंखों के सामने वहीं दिन आ गया था जिसके बारे में मैं कभी सोचना भी पसंद नहीं करती, धीरे-धीरे मेरी आंखों के सामने मेरे बीते हुए कल की परते खुलती चली जा रही थी-

मेरी सगाई का दिन करीब आता जा रहा था मेरा रिश्‍ता एक उच्‍च वर्गीय परिवार में तय हुआ था, घर के सभी लोग इस रिश्‍ते से बेहद खुश थे। सब बढ़-चढ़ कर तैयारियों में लगे हुए थे लेकिन मेरे मन में अपनी सगाई और शादी को लेकर कोई खुशी नहीं थी, मेरी खुशियां तो उसी दिन खत्‍म हो गयी थी जिस दिन मेरे परिवार ने मेरे और अरमान के पवित्र प्‍यार के रिश्‍ते को यह कहकर बेइज्‍जत किया था कि अरमान और उसका परिवार हमारे घर से रिश्‍ता जोड़ने के काबिल नहीं है। एक पल में ही मेरी सारी दुनिया बदल गयी थी, मैं यह सोच ही नहीं पा रही थी कि आखिर लोगों के मन में यह क्‍यूं है कि ज्‍यादा हाई - प्रोफाइल के लोग ही सुखी जीवन जीते हैं। मैं हार गई थी मम्‍मी को समझाते-समझाते कि मेरी खुशी सिर्फ अरमान में है वो मुझे समझता है मेरी हर खुशी का ख्‍याल पहले रखता है और उसका परिवार भी मुझे अपनाने के लिए राजी है लेकिन मेरे घरवालों ने जिन्‍होने आज तक मेरी छोटी-से-छोटी खुशी का ख्‍याल रखा था वे आज मुझसे मेरी जिन्‍दगी की सबसे बड़ी खुशी छीन रहे थे। कहीं न कहीं मम्‍मी-पापा के मन में अपनी बिरादरी से अलग जाकर रिश्‍ता जोड़ने पर समाज के तानों का डर समाया हुआ था लेकिन क्‍या किसी कि खुशी इन तानों से बढ़कर होती हैं ?

मैंने भी अपने घरवालों की इज्‍जत की खातिर अपने 6 सालों के प्‍यार की तिलांजलि दे दीं थी। अरमान ने भी मेरे फैसले को स्‍वीकार करते हुए हमेशा खुश रहने का वादा कर मुझसे दूर हो गया, लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हम एक-दूसरे के बिना खुश रह ही नहीं सकते थे। कई-कई रातें मैंने बैठे-बैठे आंसूओं के समन्‍दर में काट दी थी, मुझमें अरमान से जुदा होकर जीने की शक्‍ति तो थी लेकिन किसी और के साथ जिन्‍दगी के सफर को तय करने की शक्‍ति मुझमें नहीं थी। लेकिन कोई भी ये समझने को तैयार ही नहीं था उन्‍हें मेरी खुशी से प्‍यारी समाज की खुशी की परवाह थी।

देखते-ही देखते सगाई का दिन भी आ गया, मेरे हाथों में मेंहदी लगायी जा रही थी जिस पर रंग चढा़ने के लिए नए-नए तरह के उपाय किये जा रहे थे पर जब मेंहदी का रंग सामने आया तो उसमें उस रंग जैसी कोई रंगत थी ही नहीं जो हमेशा बिना किसी उपाय के मेरे हाथों पर अपने आप ही आ जाया करती थी, मैं जानती थी अरमान से ज्‍यादा प्‍यार करने वाला मुझे मिल ही नहीं सकता।

मैं सगाई के कार्यक्रम में होकर भी वहां नहीं थी, मेरे मन में यही सवाल आ रहे थे कि मैं इस इंसान को जो मेरा पति बनने वाला है, अरमान को जिसने मुझे जीया है या फिर अपने आप को, किसको धोखा दे रही हूं ? किस समाज के लिए अपने सच्‍चे रिश्‍ते को जिसने हमेशा मुझे खुशी दी उसे खोने जा रही हूं। क्‍या इससे मैं खुश रह पाउंगी, अरमान खुश रह पाएगा, वह इंसान खुश रह पाएगा जिसकी होकर भी मैं जिसकी कभी नहीं हो सकती। यही सब सोचते-सोचते मैंने सगाई की सारी रश्‍में पूरी कर ली। शरीर से तो मैं उन सारी रश्‍मों में शामिल थी लेकिन आत्‍मा से नहीं। सारा कार्यक्रम समाप्‍त हो गया, लड़के वाले अपने शहर लौट गये, हम भी कार्यक्रम स्‍थल से वापस अपने घर आ गये। मैं जानती थी कि इस चकाचौंध में किसी को भी यह अहसास नहीं रहेगा कि क्‍या मेरा दिल खुश हैं या नहीं ?

रात के समय जहां सब थकान से चूर होकर नींद की गहराईयों में डूबे हुए थे वही मेरी आंखों से नींद कोसों दूर जा चुकी थी। मेरी आंखों के सामने तो सिर्फ अरमान का वो निस्‍वार्थ प्रेम झलक रहा था जिसके सपने मैंने अपनी आंखों में संजोए थे। मुझे यह सब गलत लग रहा था मैं उठकर खड़ी हो गयी और सोचने लगी कि झूठे रिश्‍तों के चलते मैं अपनी खुशियों को नहीं खो सकती, रही बात मम्‍मी-पापा की तो वे मेरे अपने है मुझे जरुर समझेंगे और मैंने अरमान को फोन लगा दिया, शायद वह मेरे ही फोन का इंतजार कर रहा था जो उसने एक ही घण्‍टी पर फोन उठा लिया। उसके रिया कहते ही मैं अपने आप को रोक नहीं पाई और कहने लगी कि वह मुझे अपने साथ ले जाये लेकिन वो मुझे लगातार समझा रहा था कि यह गलत है, मैंने कहा कि प्‍यार में कुछ गलत नहीं होता अगर तुमने मुझसे सच्‍चा प्‍यार किया है तो मुझे ले जाए। यह सुनकर अरमान मेरे सामने झुक गया और उस रात हम दोनों दूसरे शहर भाग गये। मुझे मेरी सहेलियों के द्वारा पता चला कि लोगों ने बहुत बातें की, तरह-तरह से जलील करने की कोई कसर नहीं छोड़ी। मुझे लोगों के तानों और उनकी बकवास का कोई डर नहीं था, चिंता थी तो सिर्फ अपने मम्‍मी-पापा की, बार-बार उनका चेहरा मेरे सामने आ रहा था।

कुछ दिनों बाद ही पता चला कि जिस लड़के से मेरी सगाई हुई थी वह भी अपने घरवालों के दबाव में आकर मुझसे शादी कर रहा था और वह भी किसी लड़की के साथ भाग गया है।

कुछ समय बाद मैंने खुद पापा को फोन किया और मांफी मांगते हुए रोने लगी कि तभी मुझे चुप कराते हुए पापा बोले, नहीं रिया इसमें तुम्‍हारी कोई गलती नहीं है तुमने जो किया बिल्‍कुल सही किया, बच्‍चों के गलत कदम उठाने के पीछे कहीं न कहीं हम मां-बाप भी जिम्‍मेदार होते हैं। झूठी शान के चलते हम भूल जाते है कि हमारे बच्‍चों की खुशी किसमें है। बस तुम अब वापस आ जाओ मैं खुद तुम्‍हारी शादी अरमान से करवांउगा। यह सुनकर मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। अरमान के घरवालों ने हमारे भाग जाने पर थोड़ी नाराजगी जताई लेकिन फिर वे भी हमारी खुशी में शामिल हो गये।

मैं अपनी शादी के पलों में खोई हुई थी कि तभी भाभी बाहर से दौड़ती हुई मेरे सामने हैरान-परेशान सी आकर खड़ी हो गयीं। मेरे पूछने पर कि क्‍या हुआ, इतनी परेशान क्‍यूं हो- तब उन्‍होंने बताया, कि रमा कल रात को किसी लड़के के साथ भाग गई। यह सुनकर मेरे मन में उठ रहा तूफान अपने आप शांत हो गया और मेरी रमा के प्रति बैचेनी भी खत्‍म हो गई और साथ में मेरे होठों पर एक मीठी-सी मुस्‍कान दे गयी।

पारुल भार्गव

शब्‍दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

parulbhargava16@gmail.com

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4 टिप्पणियाँ "पारुल भार्गव की कहानी - सगाई"

  1. बेनामी10:46 am

    bahut achha hai
    par kya ghar chhod kar bhagna hi ekmatra upay hai

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  2. vartman me aisi ghatnaye aam haikahani ki yh ek naie vidh a
    haijiske nayak nayika ka nirdharanh viccharniy hai

    उत्तर देंहटाएं

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