सन्‍तोष कुमार सिंह की कविता - वोटों के भिखारी

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वोटों के भिखारी
     (सन्‍तोष कुमार सिंह, मथुरा)

ए. सी. घर में रहने वाले, धूल फाँकते हैं।
निर्धन की कुटिया पर जाकर, भीख माँगते हैं॥

उतर कार से वे छूते हैं, पाँव अरे! उनके।
बिन जूतों के धूल सने औ' पाँव फटे जिनके॥

गाँव-गाँव में दर-दर घूमें, कुशल मदारी जी।
चोला बदल पुनः लंकेश्‍वर, बने भिखारी जी॥

समय-समय का फेर, कभी ये गम दे जाते हैं।
पानी माँगो आज अगर तो, ‘रम' पकड़ाते हैं॥

जनादेश खण्‍डित मिलता तो, पैठ लगाते हैं।
घोड़ों के सँग गधे, करोड़ों में बिक जाते हैं॥

जिह्‌वा पर है झूठ, रक्‍त में, है गद्‌दारी जी।
सब ही दिखते नाग किसे दें, वोट तिवारी जी॥

वोट न दें तो वही कमीने, फिर से लूटेंगे।
वोटों की दो चोट कमीने, तब ही टूटेंगे॥

वोटर तो बस किसी भले को, सिर्फ जिता देगें।
होगा भला तभी खुद नेता, चरित उठा लेगें॥
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(कार्टून - काजल कुमार - साभार - http://kajalkumarcartoons.blogspot.in/2012/02/blog-post_19.html )

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